गुरुवार, 30 जुलाई 2009

दूसरा दिन : बाउ मण्डली और बारात एक हजार

पिछले भाग से जारी...
(प)
सुद्धन यानि सदानन्द।दुबली लम्बी शरीर, गौर वर्ण। भूरे बाल और भूरी आँखों के कारण लोग ‘कैरा’ भी कहते थे। शौकिया पढ़ाकू खेतिहर थे । संस्कृत, इतिहास, पुराण, गणित और ज्योतिष के ज्ञाता। माँझी टोले के निवासी – बाउ के गोत्र से नीचे और उम्र में पाँच साल बड़े। बाउ ने दूसरे दिन के जनवासे के लिए चेताया तो हँस दिए ,’देखल जाई (देखा जाएगा)’।
विवाह संस्कार प्रारम्भ होने पर गीत गाने के लिए जब माँ ने झलकारी की ओर देखा तो वह सो चुकीं थीं। जिन पाँच औरतों को झलकारी ने श्रम आयोजन से मुक्त कर दिया था, सुरसतिया की तीन सहेलियों के साथ बस वही मड़वे(मण्डप) में थीं। गाँव का शायद यह पहला विवाह था जिसमें इतना सन्नाटा था। थका हारा नारी समाज अपने अपने घरों में सुख की नींद सो रहा था – लड़ाई जो जीती जा चुकी थी।
माँ ने कढ़ाया (आलाप लिया)
उठीं राजा रामचन्नर ऊठीं हे SSS
जब भैया करइहें पनिगरहन तबही रउरा बिहअब
जब बाबा दिहें कन्यादान तबही रउरा बिहअब हे SS”
हजारों हजार साल पहले राम ने सीता से विवाह किया था। आज तक परम्परा स्मृति में है वह विवाह। राम और सीता के कर्म और साथ साथ भोगे दु:खों की कारुणिक अनुभूति ने जैसे हर विवाह में अपना स्थान बना लिया था। इन गीतों के बहाने जैसे दुल्हे दुल्हन दोनों को दाम्पत्य जीवन की भारी जिम्मेदारियों से आगाह किया जाता था।
कोने में बैठे मिसिर धीमे धीमे जाने क्यों राम लला नहछू गाने लगे। एकमात्र श्रोता थे – बाउ। हूँ, हूँ SS|
सप्तपदी प्रारम्भ हुई।
“जब बियहब हे राम तब बियहब हे राम
सातो फेरवा लगाइब तबही रउरा बिहअब”
हरिहर ने समाप्त कर सिन्दूरदान के लिए मंडप खाली कर दिया। इस सबसे महत्त्वपूर्ण अवसर के लिए वेदों में कोई मंत्र नहीं थे। अत्यंत गोपनीय यह कर्मकाण्ड केवल नारी समाज की गवाही में होता था। क्या इसीलिए सिन्दूर इतना महत्त्वपूर्ण है?
हाथे के सिन्होरवा लेहले सखी सब ठाढिSS रे
उठि राजा राम चन्नर करीं सेनुरदान हे SS”
भोर की लाली फैलने के पहले ही सिन्दूरदान हो गया। सिन्दूर लगाते समय सारा सिन्दूर सुरसती के नाक के नीचे तक उतर गया। कहते हैं ऐसी दुल्हन पति की बड़ी दुलारी होती है।
बाउ मगन हो गए- “भइल बियाह मोर करबे का (विवाह तो सम्पन्न हो गया, अब क्या)”?
(फ)
दूसरा दिन। जैसा कि तय था, बड़े सबेरे भुरकुआ (भोर का तारा) की जगमग रहते ही सुक्खल सबकुछ ले हाजिर हो गया। बारात में राशन और लौना (ईंधन) पहुँचा कर बाउ ने बैलों की सेवा चालू की। पठ्ठों ने बहुत साथ दिया था।
अब जरा उनका भी परिचय हो जाय। एक था गोलवा (पीली रंगत लिए नीची तरफ मुड़ी सींगों वाला)। एकदम सुद्धा (सीधे स्वभाव वाला), बच्चों का प्यारा और भारी शरीर के बावज़ूद बला का तेज भागने वाला। बाउ ने इसे कभी नहीं नाथा (नकेल, नाक की बीच की हड्डी छेद कर पहनाई गई रस्सी जानवरों को नियंत्रित करने के लिए प्रयुक्त)
दूसरा था धौरा (धवल शरीर, सुन्दर लम्बी सींगें तलवार की तरह)। उग्र, ग़जब का मरखाह (सींग से मारने वाला)। बाउ के अलावा किसी की क्या मज़ाल जो पास भी फटके। छरहरे शरीर का होने पर भी जोतने और भार उठाने में प्रवीण। एक बहुत ही मार्के की बात थी कि दोनों बैलों में कभी लड़ाई नहीं हुई। बाउ कहते थे कि किसी गड़ुवान(गाड़ीवान) का जबरपन (बल और नियंत्रण) जानना हो तो पता करो कि उसके बैल आपस में लड़ते हैं क्या?
(ब)
अचानक ही गाँव में नगाड़े बजने लगे। पता चला कि बारात के मालिक नाहर सिंह ने घुड़दौड़ देखने को सभी गाँवों को न्यौता दिया है। बाउ ने जिस समय सुना उस समय बैलों की मालिश और नहान खत्म कर उनके सींगों को कड़ुवे तेल और सिन्दूर से चमका रहे थे।
यह तो अज़ीब बात थी। दूसरे दिन का पूर्वाह्न तो बाराती आराम करने और नाच देखने में बिताते थे और अपराह्न मरजाद जनवासे में। इसी दरमियान दिन में दुल्हा खीर खवाई (विशेष निमंत्रण पर दुल्हा बारात से वापस ससुराल आता था। मूँज घास के बने मंडप में जिसमें विवाह सम्पन्न हुआ होता था, बैठ कर खीर या दही चिउड़ा खाता और उपहार इकठ्ठा करता । रिसियाने (रूठने) की परम्परा होती और दुल्हा तब तक रिसियाया रहता था जब तक मुँह माँगा उपहार न मिल जाय। कई बार तो बारात से बुज़ुर्गों को आकर समझाना पड़ता था) से निपट लेता था।
गाँव में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि कोई बारात वाला कुछ अनूठा करे और नगाड़ा बजवा कर देखने को बुलवाए। बाउ ने मन को समझाया ,” अइसन बरातियो त आजु ले नाहीं आइल रहलि हे (ऐसी बारात भी तो आज तक नहीं आई थी)।“ जल्दी जल्दी बैलों को निबटा कर कमर पर गमछा बाँधते हुए खलिहान की तरफ झड़क (तेज कदमों से) चले। पगड़ी अभी तक सिर पर ही थी।
(भ)
खलिहान से अहिरटोली के तरफ के रास्ते के दोनों तरफ समतल परती (बंझा या छोड़ दी गई खाली पड़ी धरती) थी। नाहर ने घुड़दौड़ की व्यवस्था यहीं की थी। गोलाई में भींड़ इकठ्ठी हो चुकी थी। रास्ते के एक तरफ नीची मचाननुमा जगह पर नाहर का सिंहासन लगा था, दूर सीधाई में रास्ते के बीचो बीच रोली पुता भाला डण्डे की ओर से जमीन में गड़ा था, फलक पर बिंधा था –छोटा सा कोंहड़ा (कद्दू)।
योग्य और प्रशिक्षित घुड़सवारों ने प्रदर्शन प्रारम्भ किए । पहले सूर्य देव के उदय को प्रतीकात्मक रूप से सात घुड़सवारों ने एक ऊँचे कद के घोड़े को केन्द्र में रखते हुए दर्शाया – सूर्यवंशी नाहर फूल उठे। फिर घोड़ों पर गोले के अन्दर ही थोड़ी देर चौगान। गोले में घूमते हुए विपरीत दिशा से आते दो घुड़सवारों ने जब बिना टकराए अपने घोड़े बदल दिए तो भींड़ आनन्द से पागल हो उठी।
बाउ उत्सुकता में खिसकते खिसकते न जाने कब मचान के एकदम पास पहुँच गए थे। अंतिम प्रदर्शन था- रास्ते पर धँसे भाले की तरफ घोड़ा दौड़ाते जाना और बिना उसे गिराए और बिना रुके कोंहड़ा (कद्दू) लेकर वापस आ जाना। भींड़ तो जैसे मतवाली हो गई थी।
लोहा गरम जान नाहर सिंह ने आवाज दी,’बाउ, कुछ इहो कुल जानेल कि खाली बैले भँइस डहरावेल (यह सब भी आता है कि केवल बैल भैंस ही घुमाते रहते हो)। बाउ ने उपहास समझ सुना अनसुना कर दिया। लेकिन नाहर तो जैसे उतारू ही थे। दुबारा कोंचा ,” सुनलSS नाहिं का। दलिद्दर खेतिहर बहिरो होलें का (सुने नहीं क्या? दरिद्र खेतिहर बहरे भी होते हैं क्या)? और.... वही अट्टाहस, बाउ ने नजरें उठाईं तो ... गजकरना, नाहीं नरसिंघवा, गजकरना, नरसिंघ हा! हा!! हा!!!
कुएँ के भीतर से जैसे आवाज आई हो ,’नरसिंघ..’ चेतना ने सँभाल लिया , ..’वा’ नहीं बोलना, सम्माननीय है।
. . .बरसों पुराना गुरु गोनई नट्ट का आदेश,’बउआ, कब्बो देखावा खातिर बिद्या जनि उघरिह। पाप होला (कभी दिखावे के लिए विद्या का प्रदर्शन नहीं करना, पाप होता है)। . . मामा के यहाँ तो रात थी ! बचपन या बचपना ? ब्रह्मराक्षस! लेकिन आज? भरी दुपहरी, हजारों की भीड़!
. .गुरु का आदेश? पाप तो उसी दिन हो गया था गुरूजी जिस दिन बैल की पीठ पर बिठा दिए थे। बैल की पीठ पर तो केवल भोले शंकर ही बैठ सकते हैं। खेतिहर का बेटा तो सोच भी नहीं सकता। गाड़ा में नाधने पर बात और हो जाती है। ये क्या किया?
‘चुप्प! जोगी अउर नटुए ई कुल नाहीं मानेलें (चुप रहो, जोगी और नट्ट यह सब नहीं मानते)’।. .
हा! हा!! हा!!! ‘का हो गइल (क्या हो गया)? डेरा गइल (डर गए)?...नरसिंघवा, गजकरना . .
आत्मनिरीक्षण से उपर आ बाउ ने दृष्टि उठाई। कठिन परीक्षा। गाँव वाले क्या सोचेंगे? भींड़ जैसे सन्न। दहकती हुई आँखें, पाताल की गहराई से गोहार निकली ,”दोहाई गुरू, दोहाई भोले। मैनवाSSS’।
गिरता पड़ता मैनवा भींड़ से बाहर आया। “जो, गोलवा के खोल ले आउ (गोलवा बैल को खोल कर ले आओ)।“ नाहर की ओर मुँह कर बाउ बोले,’बाबू, खेतिहर का जानें घोड़ा, हम त बैले दउराइब (खेतिहर घोड़ा क्या जानें, मैं तो बैल ही दौड़ाऊँगा)’।नाहर को लगा गलती हो चुकी थी। रात को इस बनमानुख का किस्सा सुना था। पोखरे पर नाचते प्रेत! . . . . लोचना अभी तक बोल नहीं पा रहा था- गर्मी? कैसा इलाका था ये? – बारात का पूरा खर्च जैसे आपस में चुपचाप बाँट लिया हो !
भींड़ की स्तब्ध आँखों के आगे ही बाउ उछल कर गोलवा पर सवार हो गए। पापी! नराधम!! मिसिर बुदबुदाए थे। मुन्नर बोला ‘नाहीं बाबा, पाप त मनई के लागेला। परेतन के नाहीं। चुप्पे तमाशा देखीं (नहीं बाबा, पाप तो मनुष्य को लगता है, प्रेतों को नहीं। चुपचाप तमाशा देखिए)।‘
गोलवा को दौड़ाते हुए बाउ भाले के पास पहुँचे, बाएँ हाथ से पगहा सँभालते दाहिने हाथ से पूरा भाला उखाड़ लिया। मुड़ कर दौड़ते गोलवा की पीठ पर खड़े हो गए। भीड़ ने देखा - वापस आता दौड़ता बैल, उस पर खड़ा वनमानुष, हवा में लहराता गमछा और हाथ में भाला। अमानुषी किलकारी गूँजी, दूरी का अनुमान ले दौड़ते बैल की पीठ पर थोड़ा पीछे झुक अधखड़े हो बाउ ने भाला मचान की तरफ उछाल दिया।. . . सन्नाटा पसर गया।
नाहर भय से पीले पड़ गए। शान ने जैसे कदम जकड़ लिए थे नहीं तो मचान से कूद ही जाते। आँखें बन्द हो गईं। . .
खचाक! आँखें खुलीं तो देखा कि भाला मचान पर उनके आगे धँसा हुआ है। बाउ की पगड़ी उनके कदमों में। . . . झुका बैठा बनमानुख माफी माँग रहा था ,’बाबू, अब अउर नाहीं, बस्स(अब और नहीं, बस)
नाहर ने मरजाद की तैयारी के बहाने घुड़दौड़ बन्द करा दी। तमाशा देखने की उनकी लालसा पूरी हो चुकी थी – सचमुच क्या?
(म)
जिस तरह द्वारपूजा में कन्या पक्ष की परीक्षा सी होती है, वैसे ही मरजाद के दिन जनवासे में वर पक्ष की। नाहर सिंह ने इस अवसर के लिए अंग्रेजी शामियाना तनवाया था । ऊँचा तोरण और शिखरों के आभास, लगे जैसे महल हो। वैसे ही द्वार, हर द्वार पर पहरेदार। भीतर जमीन पर गद्दों के उपर झक सफेद चादर। सहारा लेकर बैठने के लिए गाव तकिए। चाँदनी तनी हुई। झूमर । केले के पौधों का एक पूरा वृत्त। पूर्व की ओर मुँह कर ऊँचे मंच पर लगा भव्य सिंहासन जिस पर दुल्हा रणवीर बैठ जनवासे का मौन सभापतित्त्व कर रहा था। सिंहासन के उपर यंत्र चालित बड़ा दुपखिया पंखा, जिसे एक सेवक डोरी खींच छोड़ चला रहा था। कितने ही सेवक बड़े पंखे ले घूमते हुए लफा कर दोनों हाथों से झलने के लिए तैयार।
बजनिए और वेश्या दल एक किनारे। सभा में जब बौद्धिक बहस समाप्त हो जाती तो ये लोग अपनी कला का प्रदर्शन करते – विशुद्ध शास्त्रीय विधि से। कोई अश्लीलता या सस्तापन नहीं।
वर पक्ष। संभ्रांतता और गरिमामय दम्भ। कुलगुरु महेशानन्द, शैव। पकी हुई लहराती दाढ़ी, प्रशस्त ललाट। माथे पर त्रिपुण्ड और आँखों में गहराई।
पुरोहित अष्टभुजा शुकुल। दाढ़ी मूँछ सफाचट। माथे पर वैष्णवी टीका। गले में तुलसी माला। श्वेत चन्दन चर्चित शरीर का उपरी भाग नग्न था। नाहर के साथ वही नौ बुजुर्ग। चेहरों पर अहंकार नाचता हुआ और आँखों में व्यंग्य भरा तिरस्कार। बाकी सभा सुभीते से बैठी हुई।
कन्या पक्ष। पँड़ोही के साथ मिठाई मिसिर। वही वेश भूषा। बगल में हरिहर। साथ में बाकी पट्टीदार। चेहरों पर धूप की लाली और विशिष्ट झुर्रियाँ जो खेतों में काम करने वालों का श्रृंगार होती हैं। बाउ, इस बार साफ धोती पहने हुए। सुद्धन उनके बगल में बैठे – अगर खड़े हो जाँय तो लगे कि जैसे खेत में ढीला चोगा पहने पुतला लगा हो। मनसुख, मुन्नर वगैरह पीछे की पंक्ति में। हजाम साज साजने में लगा हुआ था।
दोनों पक्षों के मध्य में मंगल कलश।
वर पक्ष की तरफ का भाग पूरा भरा था तो कन्या पक्ष का एक तिहाई भी नहीं।
धूपदान जल उठे। गुलाब जल का छिड़काव प्रारम्भ हुआ और पंखे झलने वाले हाथ सक्रिय हो उठे। कटे हुए सूखे फल और शरबत लिए सेवक घूमने लगे।
महेशानन्द और अष्टभुजा बाबा ने स्वस्तिवाचन से कार्यवाही प्रारम्भ की, “स्वस्ति नो इन्द्रो, स्वस्ति नो पूषा...”। गम्भीर वेदध्वनि से शामियाना गूँज उठा।
उसके बाद वर की ओर मुखातिव हो सुन्दरी नर्तकी ने आलाप लिया। मधुर स्वर, मधुर काव्य का चयन और भरपूर यौवनमयी तन्वंगी तरुणी। सभा मधुमय हो उठी:
’श्रृत कमलाकुच मंडल, धृत कुण्डल ए
कलित ललित वनमाल जय जय देव हरे
.....
दिनमणि मण्डल मण्डन भवखण्डन ए
मुनि जन मानस हंस, जय जय देव हरे ‘
अवतार स्तुति का आश्रय ले नर्तकी ने दुल्हे में जैसे कन्हैया का रोपण कर दिया हो। वर को आशीर्वाद देकर नर्तकी ने झुक कर नमस्कार मुद्रा के साथ प्रस्तुति समाप्त किया। न्यौछावर की झड़ी लग गई।
अब बारी मंगल पाठ और बौद्धिक बहस की थी। परम्परा के अनुसार पहले कन्या पक्ष वर की मंगल कामना से प्रारम्भ करता था। बाउ ने हरिहर को कोंचा। लेकिन पुरोहित होने के कारण मिसिर खड़े हुए। रात भर का श्रम। वृद्ध शरीर। स्वर में थकान और स्खलन। बाउ बैठे बैठे ऐंठने लगे। हरिहर पर क्रोध आ रहा था।
“गवीश पुत्र: नगजार्तिहारी, कुमार तात: शशि खंड मौलि:।
लंकेश सम्पूजित पादपद्म:, पायादनादि परमेश्वरो वा॥“
हाथी के मुख के समान सूड़ वाले गणेश जिनके पुत्र हैं। वह कार्तिकेय के पिता जिनके ललाट पर चन्द्रखण्ड विराजमान हैं। रावण के द्वारा जिनके कमलवत चरण पूजित हैं, वे परमेश्वर शंकर सबका कल्याण करें।
किसी भी तरह से मिसिर की निहायत ही पारम्परिक और थकान लिए यह प्रस्तुति अब तक बन चुके माहौल के अनुकूल नहीं थी। वर पक्ष में न जाने कितने चेहरों पर व्यंग्य और तिरस्कार नाचने लगे थे।
महेशानन्द ने पलट वार किया -रावण कृत शंकर स्तुति ! खड़े हुए और पखावज वादक को संकेत किया। आर्यागीति छन्द, धमाल ताल पर शिव ताण्डव स्तोत्र नाद सौन्दर्य का सृजन करता गूँज उठा:
”जटाटवी गलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेवलम्ब्य लम्बिताम् भुजंगतुंगमालिकाम्
डम डम डम्म... ..
.......................
........ सुमुखिं प्रददाति शम्भु:”
महेशानन्द अंतिम तक खींच ले गए। सभा सम्मोहित सी हो गई। बाउ जैसे भी जिन्हें संस्कृत की कोई समझ नहीं थी, सुध बुध खो बैठे। 
मनुष्य की लड़ने की प्रवृत्ति! यहाँ एक दूसरे की मंगल कामना करनी थी लेकिन लड़ाई इस बात की कि कौन बेहतर और सामने वाले से अच्छे से कहता है?कौन दमदार प्रभाव छोड़ता है- इसीलिए घात प्रतिघात। हाय रे मंगल भावना !
बाउ ने सुद्धन की ओर निहारा। आँखों ही आँखों में सम्प्रेषण। भइया अब तुम्हारा ही सहारा। ऐसे माहौल में विरुद्ध वीणा वादन! सुद्धन का काम अति कठिन था। खड़े हुए। बोलना प्रारम्भ किए। एक एक शब्द जैसे गहन अध्ययन की पूँजी सँजोए था . . . जारी

11 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत ! और यह है ब्लॉग साहित्य !

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  2. आप मेरी उम्मीदों पर खरे ही नहीं उतर रहे हैं, बल्कि उससे बहुत-बहुत आगे भी निकल रहे हैं। बचपन में अपने क्षेत्र की बारातों में आयोजित शिष्टाचार कार्यक्रम में मै भी बहुत से श्लोक रटकर अर्थ सहित सुनाया कराता था। वाह-वाही के साथ कुछ रुपये भी ईनाम मिल जाते थे। एक तो आज भी याद है-

    कोयम्‌ द्वारिः हरिः प्रयाह्युपवनम्‌ शाखामृगस्यात्रकिम्‌।
    कृष्णोऽहम्‌ दयिते विभेमिसुतराम्‌ कृष्णादयात्‌ वानरात्‌॥
    राधेऽहं मधुसूदनो, ब्रजलताम्‌ तामेव पुष्पान्वितान्‌।
    इत्थं निर्वचनीकृतो दयितये, हृणो हरिः पातु वः॥

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  3. एकदम से विस्मय विमुग्ध । इस ललित लेखन पर अपनी सारा लिखा-पढ़ा न्यौछावर ।

    लोक का छिपा लालित्य सामने आ रहा है, और घात-प्रतिघात में अन्तर्भूत जीवन्त चेतना भी ।
    जोह रहा हूँ अगली कड़ी की बाट.....

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  4. जितने स्पष्ट शब्दों में जितना चिल्ला के मन्त्र पढ़े उतना ही विद्वान् पंडित ! 'क्या पंडित था फलाने के बियाह में.' आगे देखते हैं बड़े रोचक मोड़ मप्र विराम लिया है आपने इस बार. अभी-अभी ध्यान आया सुरसतिया को परबतिया लिख गया :) पिछली टिपण्णी में !

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  5. "ऐसे माहौल में विरुद्ध वीणा वादन! सुद्धन का काम अति कठिन था।"
    शिव तांडव स्तोत्र का जवाब क्या था यह जानने का बेसब्री से इंतज़ार है. लिखते रहिये! आपका लिखा पढने के बाद कौन कहेगा की टाइम मशीन नहीं होती है.

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  6. अद्भुत लेखन । शानदार किस्सागोई । अगली कड़ी का बेसब्री से इंतजार है ।

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  7. यह किश्त भी आशा के अनरूप बेहतरीन रही। सुद्धन क्या करता है, यह जानने की उत्कंठा बनी हुई है।

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  8. फुरसत से पढने का आनंद ले रहा हूँ। परबतिया वाले पोस्ट के बाद आज पिछले सभी पोस्टें पढी और हर पोस्ट अद्भुत लेखन को प्रस्तुत कर रही है। कहीं कहीं फणीश्वरनाथ रेणु जी का मैला आंचल भी झलक आया है।

    सशक्त लेखन और उम्दा शैली।

    बहुत खूब। इंतजार है, अगली कडी का।

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