मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

लंठ महाचर्चा : बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 17

पिछ्ले भाग से आगे ...

...एक भटकता औघड़ है जिसके आधे चेहरे चाँदनी बरसती है और आधा काजल पुता  है। दुनिया जो भी कहे, उसे सब स्वीकार है। वह तो रहता ही अँधेरी गुफा में है जिसकी भीतों पर भी कालिख पुती है ... वह जाने क्या क्या बकता रहता है। खुदाई कसौटी दूजों को कसता रहता है!...   

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दिन बीत चले। भवानी के नैन नक्श बहुत सुन्दर! हिरनी सी आँखें। बेटी की जन्मपत्री देखते परसू पंडित ने पूरी कुंडली बनाने के लिये पत्रा खोला और ग्रह नक्षत्र देख सन्न रह गये...विलासिनी! ममता की बाढ़ में ज्योतिष का क्या काम? प्रसन्नता जौ भर भी कम नहीं हुई – ई सभत्तर सही थोड़े होला! (यह सब स्थान सच थोड़े होता है!)  परम्परा के अनुसार वर्ष भीतर ही महोधिया की पट्टी में मुंडन होता था। उन्हों ने नामकरण और मुंडन को एक अवसर में मिला दिया ...
... देसी अंग्रेजी दोनों तरह के बाजे बुलाये गये - पूरी वर्दी में! महोधिया की नातिन का मुंडन हो रहा था। छतरी गई तो गई लेकिन नाम की आन तो रखनी ही थी। काली माई के अस्थान तब जब कि बाजे बज रहे थे, स्त्रियाँ गीत गा रही थीं, सतऊ मतऊ की मेहरियाँ कराही चढ़ाने में व्यस्त थीं और केश अभी उतर ही रहे थे कि बेटी ने एकाएक किलकारी भरते हुये हाथ पैर चलाये। जाने कैसे हुआ कि हजाम के उस्तरे से उलटे उसकी ही एक अंगुली घवा गई। वह सन्न रह गया – पियरी पहने मतवा के दायें जंघे टप टप खून!  
आँख गड़ाई रमैनी काकी ने सिर पर हाथ मारा – हे भगवान! अइसन त कब्बो नाहिं भइल रे! (हे भगवान! ऐसा तो कभी नहीं हुआ!)  हजाम की घायल अंगुली हाथ में झपट उसने जोर से दबाया – गिर जाये दे जमीनी पर। कहाँ से आइलि ई (गिर जाने दो जमीन पर। कहाँ से आई ये...)  ...अधूरे छूटे शब्द लहू रूप भुइयाँ टपके – टप! टप्प! जुटी हुई स्त्रियों में खुसफुस शुरू हो गई। आगे तो रमैनी काकी को करना ही था। परसू पंडित तड़क उठे – ए काकी! एहिजा से चलि जा नाहीं त अनरथ क देब(काकी! यहाँ से चली जाओ नहीं तो अनर्थ कर दूँगा) । काकी कहाँ मानने वाली – पंडित हो! आपन देख, हमार का? (अपना देखो, मेरा क्या?)  बड़बड़ाते हुये रमैनी काकी चली गई। पंडित के संकेत से बाकी काम सम्पन्न हुये।...  
 ...शुभ मुहुर्त देख परसू पंडित ने अपनी बेटी का आज नाम रखा है – सुनयना। मुंडन में तो खीर जेवनार की रीति नहीं लेकिन नामकरण हुआ है, सुनयना का नामकरण! परसू पंडित खदेरन के यहाँ भी जेवनार की खबर भेजवाये हैं – प्रसाद पावे अस्थाने आ जइह, जात बिरादर आपन जगह, खून खानदान आपन जगह (प्रसाद लेने देवस्थान आ जाना। जाति बिरादरी अपनी जगह, खून खानदान अपनी जगह)
खून खानदान! महोधिया वंश के नाश की शपथ लिये हैं खदेरन, कैसे जायें? देवस्थान तो जा ही सकते हैं।
इनार पर रमैनी काकी नाक सिकुड़ा हाथ चमका चमका चार स्त्रियों को सुना रही हैं – पंडितवा पगला गइल बा। भवानी के नाव रखलसि हे त गाँव भरि के जेवनार नेवतले बा। भवानी त अस्थाने देखाइ दिहलसि कि का करीऽ! बिटिहिनिन के राख ओहार, दुसरे घर करें उजियार। ई त ... कलऊ एहि के कहल जाला। नगिनियो इहाँ कहववले बा(पंडित पागल हो गया है! बेटी का नाम रखा है तो गाँव भर को ज्यौनार पर बुलाया है। बेटी ने तो काली स्थान दिखा ही दिया कि क्या करेगी! बेटियों को परदे में रखा जाता है। वे दूसरों के घर उजाला करती हैं। ये तो ... कलियुग इसी को कहते हैं। नागिन के यहाँ भी सन्देश भेजवाया है!)     
इतने दिनों बाद गाँव ने पूछा भी तो अस्तकाल! अब कितने दिन बचे? ...नागिन गर्भभार ले कैसे जाय? बबुना परसादी ले अइहें। (देवर प्रसाद ले आयेगा) ...
मुंडन के बाद उस दिन जेवनार की तैयारी से असंपृक्त सतऊ मतऊ अपनी गिरहस्ती में लग गये - गोंयड़े के खेत में लदनी थी। रास्ते पर गाड़ा निकलने भर की जगह थी। लद गया तो बैल लगाने के लिये जब सिपावा हटाया गया तो ठरक कर एक पहिया एकदम खाले किनारे आ गया। मतऊ ने पीछे दाब लगा घुमाने को जोर लगाया तो उल्लड़ हो टेंढा हुआ और अटक गया। अब या तो पूरा गाड़ा खाली कर सीधा हो सकता था या नेबुआ की बाड़ को काट घुमा कर। सतऊ ने सलाह दी कि पूछ लिया जाय। खदेरन भइया की भुतहाई से जन्मी उस खुरपेंची जगह से वे दोनों भी सहमते थे। उन लोगों को जाना नहीं पड़ा, जुग्गुल खुद सूँघता हुआ आ पहुँचा। सतऊ ने बात रखी तो जुग्गुल की आँखें फट पड़ीं जैसे पूछने वाले जितना चूतिया उसने देखा ही न हो! उसने साफ मना कर दिया।
मतऊ ने बात बढ़ने से रोकने के लिये गाड़ा खाली करने की बात कही लेकिन कुछ बात का निरादर और कुछ जेवनार में पहुँचने में देरी होते देख सतऊ थोड़ा अकड़े –देरी होता जुग्गुल बाबू! मालिक के बोलाव। ऊ अगर नाहीं कहि दीहें त खलिया देहल जाई(देर हो रही है जुग्गुल बाबू! मालिक को बुलाओ। उन्हों ने अगर नहीं कह दिया तो गाड़ा खाली कर निकाला जायेगा)   
रास्ते पर एक ओर से जेवनार के लिये निकले खदेरन आ पहुँचे थे तो दूसरी ओर से सोहित। जुग्गुल को अपनी आब दिखाने का इससे अच्छा अवसर क्या हो सकता था? उसने सोहित की ओर देख शिकायत भरी ललकार सी लगाई – देखतल दुन्नू पंडितन के दबंगई! नेबुआ काटे के कहतने सो। उप्पर से मालिक के बोलावे के बाति करतलोग! (देख रहे हो इन दो पंडितों की दबंगई! नीबू काटने को कह रहे हैं! ऊपर से मालिक को बुलाने की बात भी कर रहे हैं।) सोहित के लिये तो जुग्गुल ही आस था, उसका एकमात्र राजदार। समझ कर वह तड़क उठा – ए पंडित! ई नाहीं होई। बिना नेबुआ अस्थान के कुछु कइले जौन करे के होखे कर(ऐ पंडित! यह नहीं होगा। नीबू स्थान को बिना कुछ किये जो करना है, करो)  
सतऊ की आँख छ्लक गई – बाबू आज जीवित होते तो यह दिन न देखना पड़ता। खदेरन कैसे चुप तमाशा देख रहा है!  क्रोध में उन्हों ने मतऊ को चेताते हुये पीछे से जोर लगाया कि लदा हुआ भारी गाड़ा उलट गया। मतऊ नीचे दब गये और खुद सतऊ छटके तो सिर पर पीछे से बाड़ की थुन्ही जोर से लगी। वह वहीं लुढ़क गये।
अनर्थ हुआ देख हाँ, हाँ करते हुये खदेरन दौड़े जबकि जुग्गुल घर की ओर झड़क चला लेकिन सोहित स्वयं गाड़ा सीधा करने की कोशिश करते हुये लोगों को बुलाने को चिल्लाने लगा –दउर  जा हो! (दौड़ो लोगों!) ...
...सुनयना के नामकरण का जेवनार आयोजन स्थगित हो गया। महोधिया चंडी के दुआर पर दो घायल जन लेटाये गये थे। मतऊ का सीना दब गया था, बेहोश थे और सतऊ की आँखें खुल रही थीं, बन्द हो रही थीं लेकिन वाणी मौन थी। खदेरन के कहने पर तेल गर्म कर मालिश की जा रही थी। साँझ घिर आई, गाँव में एक बार फिर से आतंक की छाया डोलने लगी। नेबुआ के झाँखी से लेकर चमैनिया अस्थान जैसे नाम ले ले लोग लुगाइयाँ स्मृतियों की दबी आग उकसाने लगे और खदेरन? ...
... रात है। सतऊ मतऊ अभी भी होश में नहीं आये हैं। खदेरन लेटे हैं। पता नहीं नींद है कि क्या है? वही दृश्य है, चेहरे अधिक स्पष्ट हैं। गोरख जैसी आकाशवाणी है - सुभगा अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई। अब सुनयना बन पितरों के देश आई है। उसका उद्धार यहीं होगा।...  दहकते हुये दो कुंड - एक के आगे कामाख्या की विराट तिलकधारी वृद्धा माँ और दूसरे के आगे कोई जटाधारी वृद्ध बैठा है। दाढ़ी है लेकिन चेहरा नहीं है। मंत्र ध्वनियाँ अस्पष्ट हैं, बादलों में मृदंग बज रहे हैं – डम डम डम डम, म ड, म न ड, मुंड, मुंड ...माम बलि!...देहि मे!! आहुति! सतऊ-मतऊ के मुंड जल उठे हैं और वृद्ध की दाढ़ी के ऊपर मुँह, नाक, आँख, कान, ललाट सब उभरते जा रहे हैं।...जैसे एक साथ सैकड़ो पिशाचिनें चित्कार कर उठीं ...खें, खें, खें ...
घबरा कर खदेरन उठ गये। देह बर्फ जैसी ठंढी हो गई थी। अग्निशाला से बाहर निकले तो सबेरा हो गया था। वह चंडी चाचा के घर की ओर दौड़ चले। कुछ रात भर की थकान और कुछ ठंड का असर – सतऊ मतऊ को घेरे घर वालों में जो जहाँ था, वहीं सो गया था। घबराये खदेरन ने एक रजाई उठाई –मतऊ का सिर एक ओर लुढ़क गया था, खुले मुँह से लार बहने के निशान थे। उन्हों ने दूसरी रजाई उठाई - सतऊ की नाक से रक्त बह कर सूख गया था। दोनों मर चुके थे।
महोधिया वंश का नाश! नेबुआ के झाँखी  - खदेरन को अपना शपथ और अभिचार दोनों याद आये। एक क्षण में ही सब कुछ जैसे पुन: आँखों के आगे घूम गया। अब तो केवल परसू पंडित बचे। जड़ खदेरन को निज आतंक ने ही चेतन किया, मुँह से चीत्कार निकली – होंऽ ऽ, होंऽ ऽ ऽ ऽ । उस मृत्युघोष में पहले परसू पंडित और उसके बाद स्त्रियों के स्वर जुड़ गये। हाहाकार मच गया...भउजी ने कोलाहल सुना और ओका उठी ओऽ, ओऽ।  सोहित ने सुना और चंडी पंडित के घर भागने को उद्यत उसके पैर थम गये – ई का क दिहनीं हम राम!(यह क्या कर दिया मैंने राम!)  वह घस्स से वहीं बैठ गया।
खदेरन मौन विलाप में थे - उबारो माँ! किसी और को चुनो, अब नहीं सहा जा रहा!  
रमैनी काकी रास्ते में सुनयना नाम वाली धीया के बारे में सोच रही थी – कवन जनमलि फेर से? काल बनि के आइलि बाऽ। (फिर से कौन पैदा हुई? काल बन के आई है।) गाँव भर की अकाल मृत्यु प्राप्त कुमारियों की सोच सोच वह अनुमान लगा रही थी।
अपने चाचा के साथ महोधिया चंडी के घर की ओर जाता जुग्गुल अनुरोध कर रहा था – काका! एगो घोड़ौना खातिर बतियवले बानीं। आपन मन्नी बाबू साथे बढ़िहें त बादि में सवारी कइले में असानी रही(काका! एक घोड़े के बच्चे के लिये बात कर रखा हूँ। अपने मन्नी बाबू साथ बढ़ेंगे तो बाद में सवारी करने में और सुविधा रहेगी।)   मन्नी बाबू यानि मान्धाता सिंह नामधारी बच्चे के बाप ने घोड़े के बच्चे की खरीद को हामी भर दी।
... सबेरे सबेरे दूर किसी दूसरे गाँव में अपनी भैंस पर सवार एक बनमानुख घरघुमनी के बियाह को याद कर रहा था। कैसे उसने घोड़ों पर अपने बैल की मदद से जीत हासिल की! मुन्नर और मनसुख उससे भी अधिक उत्साह से हुँकारी पार रहे थे – हँ बाऊ! हँऽ
 (जारी) 

8 टिप्‍पणियां:

  1. उपस्थिति दर्ज़ करें...
    अगले अंक की प्रतीक्षा है

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  2. Bhains par sawar bau dikh gaye ....aha !!! kaleje ko thandak pahunchi...katha sun raha hoon aur hunkari bhi paar raha hoon. Ek baat aur ...jaise lok geet lupt ho rahe hain waise hi desi baaje bhi lupt hote jaa rahe hain.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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