रविवार, 13 दिसंबर 2015

केतु पेषियत


तुलसीदास राम के लिये प्रयोग करते हैं - रघुकुलकेतु। केतु शब्द का अर्थ उच्चस्थ या ध्वजा से है अर्थात रघुकुल का झंडा बुलन्द!तमिळ ज्योतिष परम्परा में केतु को इन्द्र का रूप माना गया है। इन्द्र शुभ कर्म और श्रेष्ठ बुद्धि का समन्वय है। हारा हुआ इन्द्र सूक्ष्म रूप ले केतु हो जाता है अर्थात सितार-ए-गर्दिश श्रेष्ठ।
ऋग्वेद के प्रथम मंडल के छठे सूक्त में प्रथम से तीसरी ऋचा के देवता हैं इन्द्र। इस सूक्त की एक विशेषता है कि यहाँ इन्द्र सूर्य रूप हैं। पहली ऋचा के रोचंते रोचना दिवि - समस्त दिशाओं को प्रकाशित करने वाले से अर्थ स्पष्ट हो जाता है। तीसरी ऋचा में प्रेरणा है कि भीतर ऐसे इन्द्र को विकसित करो जो सूर्यसमान अपेशसे (आकार और सौन्दर्य से हीन) को पेशो (सुन्दर आकारयुक्त) प्रकाशित कर देता है। आकार वह भी जो कि सुन्दर हो। पेश शब्द इसी कारण आगे चल कर आभूषण अर्थ में प्रयुक्त होने लगता है। जब ऐसा होगा तो अकेतवे (शुभ कर्म और श्रेष्ठ बुद्धि से हीन) केतु (श्रेष्ठता) को प्राप्त होगा। ऐसा कैसे होगा? उष: अर्थात सुसंग से (सूर्य की चमक उषा की संगति का लाभ है।) यहाँ काव्य में उषा सूर्य का प्रभाव नहीं, वह संक्रमण काल है जब मनुष्य साधना में होता है। बड़ी बात यह कि सम्बोधन में मनुष्य मात्र के लिये मर्या शब्द प्रयुक्त हुआ है। जैसे अमृतपुत्रा: वैसे ही मर्य्या:।

शुभकर्म से हटने पर उसकी दैहिक परिणति भक्त कवियों का प्रिय विषय रही है। तुलसीदास भी बलतोड़ के फोड़े को राम से विमुखता का परिणाम मानते हैं। कैसा परिणाम है? रोम रोम देह का अलंकार बन निकल रहा है - ताते तनु पेषियत घोर बरतोर मिस! ऋग्वैदिक पेश का श कोसली मूर्धन्य हो ष हो गया है।
असन-बसन -हीन बिषम-बिषाद-लीन
देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को।
तुलसी अनाथ सा सनाथ रधुनाथ कियो,
दियो फल सीलसिंधु आपने सुभायको॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरूहाइबो,

बिहाइ प्रभु-भजन बचन मन कायको।
तातें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,
फूटि-फूटि निकसत लोन रामरायको॥
- हनुमान बाहूक

कहीं 'पेशवा' का सम्बन्ध भी तो 'पेश' से नहीं?

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

मुर्दे को कलमा नहीं

ननकाना से करीब दस मील दूर के उस गाँव में बस एक हिन्दू दीवानराय का परिवार बचा रहा। कारण था तुग्गन खाँ। तुग्गन की दीवानराय से छनती थी। तुग्गन ने न हाँ बोला, न ना लेकिन उसकी दहशत ही कुछ ऐसी थी कि दीवानराय बच गया। वक़्त गुजरता गया, करीब नौ साल बाद एक दिन अच्छे भले तुग्गन का अपने घर में ही इंतकाल हो गया। किसी ने सबसे अधिक मातम मनाया तो दीवानराय ने, और तो और उसकी मौत पर सवाल खड़ा कर खुद पर भी सवालिया निशान लगा लिया उसने। गाँव वालों ने एक बात नोटिस की - उस दिन के बाद दीवान के घर की खवातीन ने घर से बाहर निकलना छोड़ दिया। पैंसठ की लड़ाई के दौरान ही दीवानराय चल बसा। अर्थी तैयार करते उसके बेटे केशव को बड़े बुजुर्ग सलामत ने रोक दिया - आग में जलाना कुफ्र है। केशव के ऊपर बिजली गिरी - लेकिन हम तो ... उसकी बात को अधूरा ही रोक सलामत मियाँ गरजे - बहुत हो गया, अब बस्स! केशव ने बाकी गाँव वालों की ओर देखा और खामोशी के पीछे झाँकती नफरत को भाँप गया। उसने हाथ जोड़े, बूढ़े जवानों के पाँव पड़ा लेकिन बात नहीं सुलझी।

दिन ढल गया तो गाँव वाले अपने अपने घर चले गये। बाप की देह के पास सारी रात केशव खामोश बैठा रहा। सुबह सलामती का सन्देश पहुँचा - दीन कुबूल कर लो तो दफना सकते हो। केशव ने न हाँ कहा और न ना। तिजहर को चुपचाप कलमा पढ़ने पहुँच गया। शुकराना सलामी वगैरह के बाद नये मियाँ कसाब ने बाप का जनाजा उठाने की बात कही तो सलामत मियाँ फौरन तैयार हो गये लेकिन तौफीक ने एक पेंच पेश कर दिया - दीवान तो काफिर ही मरा, उसको अपने कब्रिस्तान में कैसे दफना सकते हैं, हिन्दू कब्रिस्तान तो है नहीं? सलामत मियाँ चुप हो गये। गाँव तो जैसे पहले चुप था, अब भी बना रहा। कसाब ने पूछा - मुर्दे को कलमा नहीं पढ़ा सकते क्या? जवाब का इंतजार किया और चुप्पी को और गहरा बनाते घर की ओर लौट पड़ा।

उस रात तब जब कि सब मीठी नींद में सो रहे थे, कसाब मियाँ ने अपने पहले और आखिरी कुफ्र को अंजाम दिया। उनींदा गाँव जागा और इकठ्ठा हुआ - घर धू धू कर जल रहा था, न तो लाश का पता था, न कसाब का और न घर की खवातीन का। माहौल में बस उसी सवाल की चट चट थी - मुर्दे को कलमा नहीं पढ़ा सकते क्या?

अगर आप हाल फिलहाल पाकिस्तान जाने वाले हों तो मुझसे उस गाँव का पता लेते जाइयेगा। वहाँ जहाँ मस्जिद दिखेगी न, वहीं केशव का घर था। दीनी कसाब को तो न घर मयस्सर हुआ और न कब्रिस्तान ही।

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

राम की शक्तिपूजा - स्वर आयोजन, अंतिम भाग

दीपावली अमानिशा से जागरण का पर्व होती है। वर्षों से लम्बित पड़े स्वर आयोजन का प्रारम्भ करने को सोचा तो यह भी ध्यान में आया कि रात में जगना तो मुझसे हो नहीं पाता!

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा 2072 सूर्योदय के पहले, भोर में जाग कर निराला जी की इस अद्भुत कविता के अंतिम भाग का ध्वनि अंकन किया। निशा बीत चुकी थी इसलिये प्रारम्भ भी राघव के जागरण अर्थात 'निशि हुई विगत ...' से किया। सुनिये।

ध्वनि सम्पादन नहीं किया है। समर्थ जन नाम और सन्दर्भ दे कर संपादन प्रकाशन के लिये स्वतंत्र हैं।

रविवार, 1 नवंबर 2015

बँटवारे के खिलाफ

सीजन शुरू नहीं हुआ था। छोटी लाइन के उस पार पंजाब चीनी मिल की ऊँची चिमनी से वह सम्मोहक धुँआ नहीं निकल रहा था जो स्कूल पर राख बिखेर हमारे श्वेतवसन साँझ तक काले कर देता था। इसके बावजूद उसके ऊपर की छतरी मुझे बहुत कलात्मक लगती थी।  फैक्ट्री में आग नहीं थी लेकिन 'हिन्दू' इन्दिरा की हत्या से उपजी घृणा हम जैसे मासूमों के भी भीतर सुलग रही थी। बाज़ार सहित तीनों प्रमुख चौराहे अफवाहों से गर्म थे।

घृणा के बाद भी मुझे मिल के क़्वार्टर में रहने वाले हैप्पी बन्धुओं के बारे में चिंता थी। विद्यालय के शिविर आयोजन की रात जब वे दोनों गाते, मुझे पंजाबी शब्द ठीक ठीक याद नहीं - परमै पिताजी तन कुर्बाणी, देश को .... तो रोंगटे खड़े हो जाते, लगता कि गुर गोविन्द सिंह के दोनों लाल गा रहे हैं!

सरदारों की दुकानों के लूटे जाने की खबरें आने लगीं और यह भी कि केश दाढ़ी कट रहे थे। आँखों को पढ़ने में तब भी सक्षम था। सूचना देने वालों की आँखों की नफरत आज भी भीतर कहीं गजबजा रही है - उन मेहनती सरदारों की समृद्धि से जलते देसवालियों की कुंठा ने अलग रूप ले लिया था। पिताजी बेचैन थे, इन्दिरा की हत्या से उन्हें भी बहुत दुख था लेकिन उससे भी गहरे कुछ था जो उन्हें असहज किये हुये था - जो हो रहा है, ठीक नहीं है। क़स्बे की नेकनियती पर उन्हें भरोसा भी था, लूट पाट के अलावा कुछ और नहीं हो सकता! पंजाब मिल किसानों को रोटी देता है... ।

शाम को हमलोग साथ ही तरकारी खरीदने गये। लौटना गोश्तमंडी से ही होता था। कुछ सुन कर पिताजी ठिठक गये। कसाई अपनी वीरता सुना रहा था - बड़ी मरली हँई सरऊ सरदारा के। उस गन्दे दुर्गन्धित स्थान पर ठीहे के पास ही झोले में लूट के नये सामान दिख रहे थे। श्रोताओं में लगभग सभी हिन्दू ही थे जिनकी आँखों में हसरतें मचल रही थीं।  मैं उनमें प्रशंसा भाव भी देख सन्न था।
घर पहुँचने पर पिताजी दुआर पड़ी खटिया पर घस्स से बैठ गये। उनकी बुदबुदाहट में मैं बस यही सुन पाया - बँटवारा।
उस रात उन्हों ने भोजन नहीं किया। हम सबने समझा कि इन्दिरा जी की हत्या से दुखी हैं, जनता लहर में भी गाँव के विरुद्ध जा कर कांग्रेस को वोट देने वाले एकमात्र मतदाता जो थे! 
 
इतने वर्षों के पश्चात आज उनका एकरतिया अनशन समझ पा रहा हूँ - वह बँटवारे के खिलाफ था।

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 31

पिछले भाग से आगे...

गोंइठे की आग हाथ में लिये फेंकरनी धिया माई घिघियाती रहीं। सतऊ मतऊ उन्हें धिराते रहे। जब झपकी आये देवी सी दिखे – अंग, भंग, झोंटे से कस कर बाँधे हुये, समूची देह पर एक बस्तर नाहीं, बस झोंटा। करिया झोंटा बस्तर। मुँह से पुकार सी निकलती – माई माई और भवानी के रूदन में बदल जाती – केहाँ, केहाँ।

कांड की रात रमैनी काकी सो नहीं पाईं। बरमबेला में खटिया पर लेटे लेटे ही खदेरन को सराप रही थी – दहिजरा चमइन चाटे के सब कांड करवलस। सराप के फरुवाही बना देहलसि! तभी गोड़ पर मस ने काटा, काकी ने खींचा तो झूलती खटिया के ओनचन में फँस गया। जम के फाँस! काकी हड़बड़ा कर उठी। बझा गोड़ निकालने के चक्कर में भुँइया आ पड़ी।

कवन मुवाई रे हमके? भीतर भभुका सा उठा, मन बहका तो फेंकरनी, ओक रमाई, सतऊ, मतऊ, महोधिया, नगिनिया – चमइन अस्थान से जुड़े सारे मरे हुओं पर करुणा उमड़ पड़ी। काकी अहक अहक रोने लगी। जाने कितनी देर पड़ी रही। पहिली किरिन देह पर पड़ी तो बोध हुआ। आँखें पोछ खड़ी हुई तो पता चला कि पूरी रात उत्तर सिर्हान किये सोई थी। काकी के मुँह से सीताराम के बजाय निकला – डाढ़ा लागो! दोहाई हलुमान जी, दोहाई!

चूल्ह के लिये आगी लेने के बहाने पूरे गाँव का एक चक्कर काकी लगा आई। लौटी तो अपने पीछे जाने कितनी सनपाती मेहरियों में डर सँजो आई। जिन जिन ने नेबुआ अस्थान पर कभी कोई टोटका किया था उनके लिये सार्वजनिक नुस्खा छोड़ आई – कब्बो ओ पड़े न जइह सो, अगर जहई के परे त देबी के अच्छत सेनुर अगिला सुक्क के चढ़ा के माफी माँगि लीह सो! ओइजा भवानी के देंहि कटल बा। पुरान जमाना रहित त सकितपीढ हो जाइत। जहाँ से भी घूमी – कहाँ गइले रे नगिनिया?  गोहराना नहीं भूली।

 

नगिनिया आ कि सनकल सोहिता क भउजी कहाँ गई? इसरभर संघे उढ़र गई? विचित्र स्थिति थी। स्मृति में एक ओर क्षत विक्षत नवजात देह का भयानक दृश्य था तो दूसरी ओर कुलटा युवा स्त्री का सेवक के साथ पलायन। लोग अंड बंड कुछ भी सोचें, जुग्गुल और उसके खवासी लहकायें लेकिन घटना की भयानकता इतनी प्रबल थी कि मनोविलास, घृणा, क्रोध, जुगुप्सा सब करुणा में सिमट जाते और अंत में बस बच जाती – सहम। सोहित की पगलई दिनों दिन चुप्प होती गयी। जब भी अवसर मिलता कपड़े पहने ही नहा लेता – दिन में कई बार। जप चलता रहता – हमार भउजी, हमार भवानी!

 

 खदेरन के पिछले बारह दिन बारह वर्ष जैसे बीते थे। बेदमुनि और सुनयना, इन दो बच्चों के आपसी प्रेम ने मन को सँभाला था तो बेदमुनि द्वारा अनजाने ही तांत्रिक यंत्र रचना और पेंड़ के एकमात्र शिवली फूल द्वारा उसकी प्रतिष्ठा ने मन को जाने कितनी आशंकाओं की और मोड़ भी दिया था। भविष्य में क्या है? जानने के लिये कुंडली बाँचने का साहस तक नहीं हुआ!

उस दिन यंत्रवत प्रात: संध्या करते उनके सामने जैसे सुभगा बैठी थी। हवनकुंड नहीं, अघोर यंत्र था। आहुति नहीं पाँखियों की रक्तहीन बलि ... खदेरन सिहर उठे थे। स्वयं को केन्द्रित कर जैसे तैसे संध्या समाप्त किये। उसके बाद खुरपी ले कोला में ऐसे ही चिखुरते रहे – मोथा, दूब, डभिला। तन रमे तो मन रमे!

 

  पसीने से जनेऊ भीगा और पीठ पर खुजली होने लगी। झटक कर उठे और जाने कितने समय से भरा धिक्कार सवार हो गया – थाने जाने वाले थे न? और कितना समय चाहिये? भयभीत हो? साधक हो? निर्णय और संकल्प किस दिशा के यात्री हैं?

krishna_yantra प्रश्नों के गुंजलक केन्द्रित हुये और आँखों के आगे उजास ही उजास छा गया। वह यंत्र तो कृष्ण यंत्र भी है, बेदमुनि तो अक्षर भी लिख रहा था – कृष्णाय गोविन्दाय क्लीं ... गोपीजनवल्लभाय स्वाहा... नम: कामदेवाय ल ज्वल प्रज्जवल स्वाहा... कौन कन्हैया यहाँ आने वाला है खदेरन? दुविधा से मुक्त हो चलो, चलो खदेरन! कान्हा की लीला होनी भी होगी तो अभी बिलम्ब है।

घर के भीतर घुस खदेरन ने स्वयं ही निकाल गुड़ की ढेली के साथ पानी पिया, लाठी उठाये और निकल पड़े। मतवा की टोकार कंठ में ही अटकी रह गयी!

गाँव के सिवान पर जुग्गुल ने टोका – कवने ओर हो पंडित? खदेरन ठिठके, दोनों की आँखें मिलीं और खदेरन ने जो देखा वह जुग्गुल के पीछे था – सामने से इसरभर आ रहा था। हाथ की लाठी छूट गयी। (जारी)                             

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

सनातन मांस

रामायण, वैदिक छान्दस, ब्राह्मण और उपनिषदों की भाषा पाणिनि के व्याकरण से कई स्तरों पर मुक्त है। 1500 ई.पू. में सृजन या प्राक् आर्यभाषा जैसे ऐतिहासिक हास्य प्रकरण छोड़ देने पर और ध्यान से पढ़ने पर किसी भी खुली बुद्धि वाले को यह लग जाता है वेदों की भाषा बहुत पुरानी है, इतनी कि उसके कई शब्द, धातु, प्रयोगादि वर्तमान में रूढ़ प्रयोगों से पूर्णत: भिन्न हैं - सन्दर्भ में भी और अर्थ में भी।

 

कल देर रात एक मित्र से वार्ता हुई और उसके पश्चात मैं काण्व शाखा के शतपथ ब्राह्मण को पढ़ता रहा। चेतना का जो स्तर वहाँ है, उसे हम क्यों नहीं देख पाते या क्यों उपेक्षित कर निरर्थक ही बहस करते रहते हैं? आँखें भर आईं। वास्तविकता यह है कि जिसे केवल ब्राह्मणों का प्रपंच मान प्रचारित किया जा रहा है, वह पूरी मानव सभ्यता की गौरवपूर्ण थाती है। स्वतंत्रता के पश्चात अब जब कि सब कुछ सब को उपलब्ध है, अध्ययन से हम आम जन क्यों कतराते हैं? पहले भी करता रहा हूँ, आज भी शेयर करता हूँ। इसमें मेरा कुछ भी नहीं, संस्कृत के विद्वानों का बताया हुआ है।

 

'मांस' नपुसंक लिंगी शब्द है। प्रथमा से पंचमी विभक्ति तक इसका अर्थ किसी भी फल या कन्द का गूदा होता है। वाल्मीकि के रामायण को पढ़िये तो विचित्र प्रयोग सामने आते हैं - गजकन्द, अश्वकन्द आदि। उनके गूदे के लिये मांस शब्द का प्रयोग किया गया है। अब यदि कोई मार्क्सवादी उनका अर्थ यह लगाता हो कि राम के समय में हाथी और घोड़े का मांस खाया जाता था तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। वास्तविकता यह है कि भिषगाचार्य और वैद्य मृत पशुओं के शरीर का भी अध्ययन करते थे। पहचान सुनिश्चित करने के लिये कन्द विशेष के गूदे के रंग, बनावट आदि की समता के आधार पर जंतुओं के नाम पर आधारित नाम का प्रयोग करते थे। वे लोग आज के नागर जन की तरह परिवेश से कटे हुये नहीं थे। उनके लिये वन प्रांतर पड़ोस की सचाई थे और उद्योग क्षेत्र भी। सही शब्द 'माम्स' है जो कि मांस हो गया वैसे ही जैसे सम्स्कृत संस्कृत हो गयी। तो ये जो माम् स है वह किसी भी आहार के लिये प्रयुक्त था। आहार वह जो प्राण की निरंतरता सुनिश्चित करे। प्राणी वह जो प्राण(वायु) के रूप में श्वास ले। साँसों के नियमन के लिये प्राणायाम अर्थात प्राण का आयाम विस्तार।

 
लौकिक या वैदिक संस्कृत हमें मनुष्य की निरंतर ऊर्ध्व होती चेतना से परिचय कराते हैं। आहार के रूप में वनस्पतियों की श्रेष्ठता सिद्ध होने के पहले एक बहुत ही लम्बी और जटिल कालयात्रा रही है जो कि समझ की भी यात्रा रही है। शतपथ ब्राह्मण का ही एक भाग बृहदारण्यक उपनिषद है। उसमें एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्नोतरी प्रेक्षण है:


 

brihad 1

 
जैसे वृक्ष, वैसे मनुष्य। यह सत्य है। उसके रोम. इसकी पत्तियाँ; उसकी त्वचा इसकी छाल; उसकी त्वचा से रुधिर बहता है तो इसकी छाल से रस। इसलिये एक घायल मनुष्य से निकलता रुधिर वृक्ष की चोटिल छाल से टपकते रस के समान है। उसका मांस इसका भीतरी भाग है। उसकी पेशियाँ इसकी भीतरी मज्जा हैं। उसकी अस्थियाँ, इसकी लकड़ी हैं। उसकी अस्थिमज्जा भी इसके समान ही है।

तो हमारे पुरनिये (मूलनिवासी, आर्य, द्रविड़, बाबू साहब, दलित जी, यादो जी आदि सबके) संसार को इस दृष्टि से देखते थे। पिछड़े थे बेचारे, हम लोग बहुत विकसित हो गये हैं, हमारी चेतना का चरम बीफ पार्टी है। है कि नहीं?

 

भरद्वाज ने भृगु से पूछा - वृक्षों में जीवन है या नहीं? भृगु ने उत्तर दिया - जीवम् पश्यामि वृक्षाणाम्, अचैतन्यम् न विद्यते! वृक्षों में (मैं) जीव देखता हूँ, उन्हें अचैतन्य मत जानो। (महाभारत शांति पर्व)। यह आप्तवाक्य है, प्रमाण है। सनातन परम्परा के दो पुरनियों ने बताया है।

वापस आते हैं माम् स पर जिसका एक रूप मांस भी है। एक शब्द और भी है - माष। ऊड़द को माष कहा जाता था। माष और दधि का मिश्रण कहलाता था मांस अर्थात बलि अन्न। बलि का अर्थ आजकल काली माई के आगे बकरा भैंसा, गड़ासा और रक्तपात से लगाते हैं। है कि नहीं?


 

बलि का सम्बन्ध आहार से है लेकिन वह मामूली आहार नहीं है। यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे के अनुसार अपने प्राण पोषण के लिये दी गयी बलि समूचे परिवेश के लिये भी पोषक होनी चाहिये। बलिवैश्वादि का अर्थ यही है। बिना बलि दिये आहार नहीं लेना अर्थात बिना समर्पित किये खाना नहीं! तुमहिं निवेदित भोजन करहीं का भक्तिभाव भी वही है।

तो आप की जो रसोई है न रसभरी रसायन वाली अर्थात जो जीवन के लिये आवश्यक रसों की शरीर में पूर्ति करती है; वह शूना है। शूना अर्थात बलिस्थान :) सिलबट्टा शूना है, चूल्हा शूना है, पात्र शूना है ... जहाँ अग्निदेवको भीतर की जठराग्निको तृप्त करने हेतु बलि दी जाती है। समझे कि बलिवैश्वादि का वैश्वानर अर्थात दहकते अग्नि से क्या सम्बन्ध है?

 हाँ तो माष और दधि = मांस अर्थात बलि अन्न’, पशुमांस नहीं। यज्ञ पूर्णाहुति के समय दिक् पालबलि दी जाती है। कैसे? दस दिशाओं में ऊड़द, मसूर, दधि आदि के मिश्रण को पीपल के पत्ते पर रख कर दीप जला बलि दी जाती है। हमारे दिक्पाल भी मांस खाते हैं। है कि नहीं बहुबंस बाबू?

 

शतपथ की यजन् भाषा देखिये:

 गोधूम+यव (गेहूँ और जौ) का मिश्रण = लोम

इनका गूँथा गीला आटा = त्वचा

 भुना या तला आटा = मांस

हरा जौ = तोक्म

 तोक्म अर्थात त्वचा से यव वैसे ही घिरा है जैसे मांस त्वचा से।

 यथा तोक्म शब्देन यवा विरूदा उच्चते, तोक्यानि मांसम्!

 
बृहदारण्यक में ही एक कर्मकांड का वर्णन है जिसमें इच्छित संतान की प्राप्ति के लिये विभिन्न उपाय बताये गये हैं। जिसे आधार बना कर यह कहा जाता है कि उसमें बछड़े और बैल का मांस खाने को बताया गया है। आज के समय में उपलब्ध मूल पाठ लगा दिया है ताकि सुविधा रहे।

 

brihad 2

‘ओदन’ कहते हैं भात को (बनाने की विधियाँ और सान्यता अलग अलग हो सकती हैं)। कर्मकांड के अनुसार गोरा और एक वेदज्ञाता पुत्र चाहिये तो दम्पति क्षीरौदन का सेवन करें अर्थात दूध में बने ओदन का। कपिल पिंगल वर्ण का दो वेदों का ज्ञाता पुत्र चाहिये तो दही भात का सेवन करें। श्याम वर्ण लाल आँखों वाला तीन वेदों का ज्ञाता पुत्र चाहिये तो पानी में बने ओदन का सेवन करें। यदि पंडिता पुत्री चाहिये (हाँ, फेमिनिस्टों! पुत्री प्राप्ति के लिये भी कर्मकांड है) तो तिल के साथ बने भात का सेवन करें। एक बात ध्यान रखें कि यहाँ तक कहीं भी मांस खाने को नहीं कहा गया है।

अब आइये आगे। समिति योग्य सर्ववेदज्ञाता पुत्र चाहिये तो ... तो, तो... महाविद्वान मरकस बाबा के अनुयायी अनुसार बछड़े और बैल के मांस वाला ओदन खाने को बताया गया है। कारण बताये गये हैं तीन शब्द – मांस (माँस है, मांस नहीं। तो चन्द्रबिन्दु से क्या अंतर पड़ता है, अवैज्ञानिक लिपि का दोष), औक्षेण और वार्षभेण (उक्षा का एक अर्थ बैल है और वृषभ माने भी बैल) अर्थात विद्वान जी की मानें तो चन्द्रबिन्दु से कोई अंतर नहीं पड़ता और दो बार बैल का पर्यायवाची लिखा गया जिसमें से किसी एक का अर्थ बछड़ा हो जाता है। नहीं? J 
भैया जी! सर्ववेद का अर्थ चार वेदों से है। चौथा है अथर्वण, वही जिसे वैद्यकी से जुड़ा बताया जाता है। वैद्यकी का एक ग्रंथ है जिसे सुश्रुत का रचा बताते हैं। उसमें महराज लिखे हैं कि सुपुत्र की प्राप्ति के लिये दम्पति को माष का सेवन करना चाहिये। चमका कुछ? माँस (मांस नहीं) माष है। उक्षा माने बैल नहीं होता? होता है भैया लेकिन उसका एक अर्थ सोम भी होता है। वही सोम जिसे आप लोग मिथकीय विलुप्त औषधि बताते हैं। आकाश से भी वृषाकपि सोम बरसाते हैं और धरा उक्ष हो जाती है माने कि भीग जाती है! बैल जी और भीगने का सम्बन्ध दास कैपिटल में नहीं मिलेगा!

 वह जो अश्वकन्द गजकन्द वाले मांस की बात की थी न मैंने? कहाँ थी? रामायण में न? रामायण किस कुल का वर्णन करता है? इक्ष्वाकु कुल का न? पूरबिया सूर्यवंशी इक्ष्वाकु कुल वेदों की किस शाखा का पोषक था? अथर्वण शाखा का न? वह रामायण में जो सारे भारत की प्रमुख औषधियों सॉरी,  वनस्पतियों का वर्णन है वह अकारण ही नहीं है। समझ में आ गया न? 
लेकिन वह वार्षभेण? वृषभ वाला? हाँ भई, ऋषभकन्द भी औषधीय गुण वाला था जिसका मांस सॉरी गूदा बैल के माफिक
गन्धाता था, होता भी वैसे ही था, एक ठो ऋषभक भी होता है।
  देवी को जो मधु समर्पित करने को लिखा है न वह माधवी सुरा नहीं, मधु ही है जिसमें ईक्ष अर्थात गन्ने का रस भी मिला हो। देवी ऐसे ही नहीं हाथ में मधुतृण अर्थात गन्ना थामे होती हैं। यह ईक्षुदंड बाद में यक्षदंड हो गया। उसका फसली अर्थात ऋतु से भी सम्बन्ध है।

अब आखिर में आप के लिये एक ठो नारीमेध छोड़े जाता हूँ।
ततोवरो वध्यादक्षिण स्कन्धोपरि हस्तं नीत्वाममब्रते स्तिस्व पठित मंत्रेण तस्थाहृदयमालभते।
विवाह वेदी पर दूल्हा स्त्री के दायें कन्धे को पकड़ देह काट उसका हृदय निकाल लेता है (और अपने कुल में मंत्र पढ़ते हुये बाँट देता है)!
हो गया न नारीमेध? स्त्री की बलि?? अब आप का एक लेख तो बनता ही है, ‘हिन्दुओं’ में जारी नारी शोषण पर जो कि उस कारिका से आता है जिसमें स्त्री के प्रति इतनी हिंसा का भाव है! नहीं?? शुरू हो जाइये।

 

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 30

पिछले भाग से आगे ...

बिहान हो गया है। गाँव में नये जगे की खुड़बुड़ है। संध्या विधान के पश्चात खदेरन पंडित चौकी पर दक्खिन उत्तर लेटे हैं। या तो यहाँ लेटना या चुपचाप सरेह में भटकना और मतवा ने जब कहा खा पी लेना, पिछ्ले नौ दिन ऐसे ही बीते हैं। बेदमुनि भी जैसे समझता है, पास नहीं जाता ...

इन दिनों में खदेरन ने नेबुआ तंत्र अनुष्ठान से लेकर नवजात कन्या की हत्या तक के समय को पुन: पुन: जिया था। मन इतना गहरे धँस गया था कि किसी भी तरह का पलायन असंभव था। एक समय जाने कौन बरम सिर पर सवार था जो ऐसी ही मन:स्थिति में भागते कामाख्या तक पहुँच गये थे! अब किससे भागें खदेरन, कहाँ जायें? कर्मों की डोर पाँवों की फाँस बन गयी। हर अनर्थ उन्हीं के हाथों घटा था, धरती पर नहीं, उनकी देह में। छाती पर सवार यमदूत हर रात बत्ता चरचराते, घुटती साँसों के बीच नींद खुल कर भी मुक्त नहीं करती – क्षत विक्षत रक्त सनी सुभगा अन्धेरे को चीरती खड़ी दिखाई देती। सुर्ख चमकती लहू की रेखायें जैसे कि गर्भगृह में काली प्रतिमा दमक रही हो! माँ, मुक्ति दो। अब तो शाप दे कर यातना पूरी भी कर दिया! अब क्यों, क्यों माँ?

ऐसे में खेती बाड़ी से लेकर घर गिरहस्ती तक सब मतवा ने सँभाला।  नयनों के दोनों कोर से निकलते बेकहल आँसुओं की ढबढब में पंडित ने देखा कि खुले नभ में पश्चिम दिशा में चन्द्रमा विराजमान थे तो पूरब में उगते सूरज। अँजोर होने पर भी लगा जैसे दिन रात साथ साथ हों! कहीं हूक सी उठी। ज्यों तेज चोट लगी हो, हड़बड़ा कर बैठ गये। एक बार फिर से दोनों को निहार बड़बड़ाये – नौ दिन बीत गये!

कुछ ही हाथ की दूरी पर चमकती भुइँया हिसाब की रेखायें थीं जिन्हें मिटाना मतवा भूल गयी थीं। दलिद्दर की घरनी – खदेरन ने मन ही मन सोचा और दुवार पर ही टहलने लगे। घरनी उनकी भेदिया थी। इन दिनों ऐसे बतियातीं जैसे कोई बहुत ही गोपनीय बात कर रही हों लेकिन उसमें गाँव गिराम की रोजमर्रा की खोज खबर ही होती। चिंता असवार स्वर कहीं पंडित फिर से भाग न जायँ! ... तीसरे दिन ही जुग्गुल ने सोहित का गोंयड़े का खेत जोतवा लिया था – पगलेट का क्या ठिकाना, जाने कब ठीक हो?  ये रहा रेहन का कागद। गाँव चुप्प रहा लेकिन खदेरन की हड़पने वाली बात सबको समझ आ गयी थी। ... सोहित, इसरभर और भउजी का कहीं अता पता नहीं। लोगों में सन्देह पुख्ता था कि कोई बड़ा कांड उनकी नाक नीचे हो चुका है और पता ही नहीं! ...रमेसरी से मतवा की रार भी हुई। उसने बस यह कहा था कि खदेरन पंडित को सब पता है। खदेरन किस से कहें कि न तो वे अगमजानी हैं और न ही भविस्स देख सकते हैं? अपनी बिद्या का आतंक तो उन्हों ने खुद फैलाया था। उसके आगे खुद असहाय थे – नेबुआ वाला टोटका इतना असरदार कैसे हो गया? ... हरदी ओरा गयी है, साहुन के यहाँ से मँगानी पड़ेगी ...हल्दी शुभ होती है खदेरन! शुभ खत्म हो गया! ... लोग नेबुआ मसान वाला रास्ता फिर से बराने लगे हैं ... सही कही बेदमुनि की महतारी, वह मसान ही है जिसकी चौकीदारी में सबसे बड़ा झुठ्ठा नीच जुग्गुल लगा हुआ है।

... नीचे धोती की खींच का अनुभव कर खदेरन थम गये। पीछे मुड़ कर देखे तो परसू पंडित की बेटी सुनयना थी। बिहाने बिहाने भवानी घर छोड़ यहाँ कैसे आ गई? सुहावन गौर चेहरे पर लाल बाल अधर – देवी स्वयं पधारी हैं, खदेरन सब भूल वर्तमान में पूरी तरह पग गये!  मुस्कुराती बच्ची हाथ फैलाये निहोरा सी कर रही थी – हमके कोरा ले ल! कितना भोला मुख, सम्भवत: घर का कोई बड़ा आसपास ही हो, खानदानी शत्रुता भूल खदेरन ने भवानी को गोद में उठा लिया – एन्ने कहाँ रे, बिहाने बिहाने? दूध पियले हउवे की नाहीं? उसे गोद में लिये कोला की और आगे बढ़ गये। शिउली गाछ के नीचे बेदमुनि धूलधूसरित जमीन पर बैठा कुछ करता दिखा। खदेरन पास पहुँचे – देख तs के आइल बा?

हाथ में लकड़ी लिये बेदमुनि तल्लीन भुँइया कुछ खींचने में लगा हुआ था। त्रिभुजों की शृंखला जो कि क्रमश: सुगढ़ होती आकृतियाँ दर्शा रही थी। बेदमुनि जैसे आखिरी खींचने में लगा हुआ था – एक दूसरे में प्रविष्ट दो त्रिभुज, षड्भुज आकार। यह तो यंत्र है, किसने इस बच्चे को सिखाया?... अवाक खदेरन ने सुनयना को गोदी से नीचे उतार दिया। वह जा कर बेदमुनि के सामने बैठ गयी – भइया! ... यंत्र के दो सिरों पर अब बेदमुनि और सुनयना बैठे थे। ऊपर से एक शिउली पुहुप गिरा – ठीक केन्द्र में। प्रात:काल हरसिंगार! इस महीने?  चौंक कर सिर ऊपर उठाये। झाड़ एकदम खाली था, भूमि पर भी कोई दूसरा फूल नहीं लेकिन यह भीनी सुगन्ध? खदेरन स्तब्ध थे, कैसा संकेत! ...सुनयना की जन्मकुंडली देखने पर उपजी भविष्यवाणी मन में मुखर थी – विलासिनी... ऋतेनादित्यास्तिष्ठंति दिवि सोमो अधि श्रित:

स्वयं को सम्बोधित कर बुदबुदाये - ऋतावरी प्रज्ञा का आह्वान करो खदेरन! ... दोनों बच्चे एक दूसरे का हाथ थामे दूर भागे जा रहे थे। पंडित ने आह भरी – रक्त अपना ठौर पा ही जाता है।

(जारी)       

रविवार, 20 सितंबर 2015

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 29

पिछले भाग से आगे...

रमैनी काकी माने माया छाया एक देह। कुछ पहर पहले ही जिस नगिनिया भउजी के लिये मन में माया हिलोर ले रही थी वह जुग्गुल की एक बात से अपनी पुरानी छाया में आ गई थी। रक्कत देख सन्तोख नहीं पूरा था, काकी तमाशा देखने को गोहरा रही थी!

घेरा तोड़ते खदेरन आगे पहुँचे तो जो वीभत्स दिखा वह कहीं नहीं, कभी नहीं दिखा था, कमख्खा में भी नहीं। एक नवजात मानुष देह क्षत विक्षत पड़ी थी, पास ही मझोले कद का एक कुत्ता किसी धारदार हथियार से कटा पड़ा था और जुग्गुल भ्रष्ट भैरव बना एक हाथ में टाँगी और दूसरे में नवजात की टाँग लिये उछ्ल रहा था। लाल कपड़े पर भी रक्त के छींटे स्पष्ट थे, धरती पर खून ही खून। रमैनी काकी को पंडिताइन के लाल गोड़ निसान याद आ गये, खुद को सँभालने को लबदी का सहारा ले धीरे धीरे वहीं बैठ गयी। दोनो गोड़ पानी जैसे हो गये थे!

जुग्गुल चिघ्घाड़ उठा – महापातक भइल बा गाँव में, महापातक! मुसमात देवर संगे सुहागिन भइल, केहू जानल? नाहीं। नागिन पेटे जीव परल, केहू जानल? नाहीं। भवानी पैदा भइल, केहू जानल? नाहीं। खेला देख जा पंचे, खेला! भवनिया के मुआ के एहिजा, भरल गाँव के बिच्चे गाड़ देले रहलि हे नगिनिया! बसगित में मुर्दा गड़ले रहलि हे नगिनिया खोनि के पिल्ला नोचत रहलें हँ सो, आपन पलिवार त खाही घरलसि, गाँव के सत्यानास करे चललि बा नागिन। रउरा पाछ्न के लइके फइके कुँवारे रहि जइहें, के बियही ए गाँवे जब ई खिस्सा चहुँ ओर फइली? कुलटा हे नगिनिया, कुलटा!...

(गाँव में बहुत बड़ा पाप हुआ है, महापातक! विधवा देवर संग सुहागिन हुई, किसी ने जाना? नहीं। नागिन गर्भवती हुई, किसी ने जाना? नहीं। बेटी पैदा हुई, किसी ने जाना? नहीं। तमाशा देखो पंचों! तमाशा। बेटी को मार कर यहीं, भरे पूरे गाँव के बीच नागिन ने गाड़ दिया था! बस्ती में नागिन ने मुर्दा दफन किया था, कुत्ते खोद के नोच चोथ रहे थे! अपना परिवार तो खा ही गयी, नागिन अब गाँव का सत्यानाश करने चली है। जब यह किस्सा आस पास फैलेगा तो उसके बाद कौन अपनी संतान इस गाँव में ब्याहेगा? आप सब के बच्चे कुँवारे रह जायेंगे। नागिन कुलटा है, कुलटा!...)

... कुलटा हे नगिनिया कुलटा! – सोहित के कान बस यही स्वर पड़े। बुढ़िया आँधी भरे मन ने स्वर पहचाना – जुग्गुल काका? एक ही सहारा था, वह भी...गद्दार...हमार भउजी कुलटा?

नयनों के आगे भीड़ दिखी, लाल लाल जुग्गुल दिखा, लाल आँखें, भउजी की काली आँखें, करिखही राति, बबुना... ढेबरी की लौ सम भक भक करिखही आँख... मस्तिष्क में भरे अरबों तंतुओं का आपसी संतुलन टूटा और काला पर्दा तन गया। सोहित के गले से माँ से बिछड़े पड़वे सी गुहार निकली – हमार भउजी कुलटा नाहीं, कब्बो नाहीं रे जुगुला! नरखा फाड़ते, केश नोचते सोहित जुग्गुल पर टूट पड़ा। लँगड़ा कहाँ सँभाल पाता, जमींदोज हुआ और उसके गले सोहित के हाथ कस गये...  

...सोहित के चेहरे की बदलती रंगत किसी ने सबसे पहले पहचानी तो इसरभर ने। उसे जुग्गुल की और झपटते देख इसरभर को चमैनिया अस्थान से जुड़ी सारी पुरानी घटनायें एक साथ याद आ गईं, वह पीछे मुड़ा और भाग चला – जल्दी से कुछु करे के परी,  लेकिन का? इसरभर सिर इसर सवार थे – मन में जाने कितने समीकरण बनने बिगड़ने लगे!  मलकिन के माटी कइसे पार घाट लागी? भइया त पगला गइलें! (मलकिन की मृत देह का संस्कार कैसे होगा? भैया तो पागल हो गये!)  कुलटा मलकिन, नगिनिया मलकिन ... सरापल गाँव में अब के अनरथ करी, खदेरन पंडित? ना, कब्बो ना!...(इस शापित गाँव में अब अनर्थ कौन करेगा? खदेरन पंडित? नहीं, कभी नहीं!)

...”सोहिता रे!” खदेरन पंडित ने स्वर पहचान लिया – बेदमुनि के महतारी? पीछे मुड़े और पियराती मतवा के उठे हाथ ने जैसे समझा दिया कि क्या करना है! झपट कर सोहित पर पिल गये जिसके नीचे गों गों करते जुग्गुल की आँखें बाहर निकल सी रही थीं। खदेरन को देख और लोग भी जुड़ गये। बहुत मुश्किल से सोहित का हाथ छूटा। जुग्गुल आश्चर्यजनक गति से पुन: खड़ा हो गया और सोहित? चुप्प! आँखें दूर तकती, जैसे किसी की तलाश में हों। अधखुले मुँह से लार बह रही थी, सुन्दर चेहरा विकृत हो गया था। खदेरन की आँखें भर आईं – इतने कम समय में कितनी यातना! सोहित लड़खड़ाता चल पड़ा। दूर सधी आँखें, पागल प्रलाप – भइया हो! ले चलs, भउजी के, हमके, गाँव के। घवराई भीड़ ने राह दे दी।

मन्नू बाबू के बाप के प्रचंड स्वर ने भीड़ को यथार्थ पर ला पटका – बरस बरस के नवमी के दीने, कुलदेबी पूजा के दीने अइसन गरहित कांड! थू। दुन्नू के गाँवे से बहरियावे के परी। (वर्ष में एक ही बार आने वाले इस नवमी के दिन, कुलदेवी की पूजा के दिन ऐसा घृणित कांड! थू। दोनों को गाँव से बाहर करना पड़ेगा।) विजयी स्वर में उन्हों ने प्रश्न किया - बोलs खदेरन पंडित! तोहार सास्त्र अब का कहता? कवनो दूसर उपाइ बा? आ कि चमइनियन जइसन फेंसे कुछु ...? (बोलो खदेरन पंडित!  तुम्हारा शास्त्र क्या कहता है? कोई दूसरा उपाय है? या वैसा कुछ करना है जैसा चमाइनों के साथ ...?)   

अधूरे छोड़ दिये गये व्यंग्य वाक्य में अहंकार कम, राक्षसी प्रवृत्ति का कोलाहल अधिक था। निर्बल मतवा को सहारा देते खड़े खदेरन भूत लोक में पहुँच गये। फेंकरनी गा रही थी – राम के कड़हूँ खरउँवा, कन्हैया जी के झूलन हो ... अमा की रात में सुभगा – मैं धरती हूँ बावले जिसकी वासना कभी समाप्त नहीं होती। युगों युगों से मैं तुम्हें भोगती आई हूँ, यहाँ जीवन मुझसे है। हाँ, हाँ, मुझे प्रेम करो, कहो सबसे कि मैंने धरती का सुख भोगा, कहो क्यों कि तुम्हारा कहना मुझे प्रबल करता है। हा, हा, हा...

करुणा की कीच सने मन को ठाँव मिली, उत्तर के पहले चेतना आई – धरती, भोग। यह सब षड़यंत्र है, जमीन हड़पने का। पंडितों की जमीन हड़पे, अब पट्टीदारों की जमीन हड़पने को ये नीच लगे हैं। खदेरन! तुम्हें यह सब समाप्त करना है। जाने कितनी बलियाँ इस गाँव में और होंगी। तुम्हारी करनी यह जगह शापित है, कुछ करो, कुछ करो!

“गाँव से बाहर कोई नहीं जायेगा बाबू! कोई नहीं। इस गाँव का शाप जायेगा!” खदेरन थम गये। चढ़े सूरज को घूरते तांत्रिक खदेरन का वही पुराना कौवे जैसा कर्कश स्वर भीड़ ने बहुत दिनों के बाद सुना:  

“त्वं जानासि जगत् सर्वं न त्वां जानाति कश्चन

त्वं काली तारिणी दुर्गा षोडशी भुवनेश्वरी

धूमावती त्वं बगला भैरवी छिन्नमस्तका

त्वमन्नपूर्णा वाग्देवी त्वं देवी कमलालया

सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वदेवमयी तनु:”     

 

तेज स्वर की सहम दस दिशाओं को मथती चली गयी, एक विकार से दूसरे विकार में प्रवेश करते जन जड़ हो गये थे!

“तव रूपं महाकालो जगत्संहारकारक:

महासंहारसमये काल: सर्वं ग्रसिष्यति

कलनात् सर्वभूतानां महाकाल: प्रकीर्तित:

महाकालस्य कलनात् त्वमाद्या कालिका परा ...

साकाराsपि निराकारा मायया बहुरूपिणी

त्वं सर्वादिरनादिस्त्वं कर्त्री हर्त्री च पालिका

... जो भवानी भूमि पर क्षत विक्षत पड़ी है, उसकी साक्षी मान मैं इस स्थान पर अब तक हुये सारे पापों को अपने सिर लेता हूँ। साथ ही यह शाप देता हूँ कि आज के बाद अगर किसी ने यहाँ कुछ भी टोना टोटका किया तो उसका और उसके परिवार का सर्वनाश हो जायेगा।“

धीमे स्वर में सबको सुनाते हुये खदेरन ने कहा – यह सब जमीन हड़पने की गर्हित कुचाल है। आप लोग खुद विचारें और समझें। विधि की विधना जो होनी थी, हो गयी, आगे आप सब के हाथ लेकिन अगर किसी ने यहाँ कोई टोना टोटका किया तो माँ काली की सौंह... ।

मतली आते हुये भी खदेरन ने नवजात की देह के टुकड़ों को उठाया, गमछे में लपेट भीड़ को चीरते चँवर की ओर चल पड़े। मतवा उनके अनुसरण में थीं।

 

जुग्गुल को चेत हुआ, उसने भीड़ को ललकारा – ई पखंड कवनो नया थोड़े ह, सोहिता त भटकते बा, नगिनिया के पकड़ि के बहरे कर के परी!

प्रतिक्रिया नहीं होते देख उसने पट्टीदारों को पुकारा – खून खनदान के फिकिर बा कि नाहीं? एक छोटा सा समूह सोहित के घर की ओर चल पड़ा। लोग घर में घुसे, जुग्गुल सबसे आगे भउजी की कोठरी में।

कोठरी एकदम व्यवस्थित साफ सुथरी थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो! न तो नागिन का अता पता था और न ही इसरभर का!

 

बचे दिन गाँव सरेह में दोनों की खोज चलती रही लेकिन वे नहीं मिले तो नहीं मिले! साँझ को दिया बारी पूजन के बेरा दक्खिन कोने किसी घर एक फुसफुसाहट उभरी – ऊ भवनिया देवरा के नाहीं, भरवा के रहलि हे। एहि से सोहिता पगला गइल हे अउर नगिनिया सँगे भरवा नपत्ता बा! धुँअरहा के धुँये और चूल्हे की आग के साथ यह बात घर घर में बँटती चली गयी। (वह भवानी देवर से नहीं, इसरभर के साथ हुये संबंध से थी। इसी से सोहित पागल हो गया और नागिन संग इसरभर लापता है!)  

 

शुद्धिस्नान और कर्मकांड के पश्चात कार्त्तिक शुक्ल पक्ष नवमी की उस सन्ध्या यह बात खदेरन पंडित के कान पड़ी और वह कराह उठे। शांति अब बस भ्रम थी। भीतर दाह उठने लगा। वहीं निखहरे चौकी पर लेट गये। मतवा ने हाथ लगाया तो जाना अब खदेरन की बारी थी। फीकी मुस्कान के साथ खदेरन बड़बड़ाये, सतमासी भवानी थी, नवमी के दिन सात महीनों की सँभाल व्यर्थ हुई। वे गलदश्रु हो उठे – आह, कहीं से भी सतमासी नहीं लगती थी... सुभगा!

... बेदमुनि की माँ, यह इकट्ठे पापों की ताप है, जल्दी नहीं जायेगी। धीरज रखना। जब भी यह काया ठीक हुयी, शिकायत ले थाने तो जाऊँगा ही।       

 

छिप कर सुने गये खदेरन के निश्चय के साथ लोगों की थू थू को जुग्गुल अपनी कोठरी में दुहरा रहा था।  उसके हाथ पीले बस्ते के वही कोरे कागज थे जिन पर अंगूठों की छाप थी। चेंचरा बन्द कर ढेबरी जला वह कुटिल मुस्कान लिये लिखता जा रहा था - हम कि सोहित सिंह वल्द ...

 

(अगले भाग में जारी)

रविवार, 13 सितंबर 2015

फेयरनेस क्रीम, आर्यत्त्व और नासमझी

तमिळ भारत में विज्ञापन दिखा - ‘गोरेपन’ की क्रीम का। इस लगभग कम काले, काले और पूर्ण काले क्षेत्र में गोरेपन की क्रीम के इतने महँगे प्रचार का एक ही तुक समझ में आता है – गोरी प्रभु जाति के सम होने की दमित इच्छा का पोषण। गोरा सुन्दर हो, आवश्यक नहीं। सुन्दरता तो एक सम्पूर्ण प्रभाव होती है जिसमें ढेर सारे कारक काम करते हैं। प्रभु वर्ग का गोरापन हमारे भीतर सैकड़ो वर्षों से पैठा हुआ है। इसके साथ कहीं न कहीं आक्रांता, अत्याचार, दमन, जातीय नाश आदि, वर्तमान अकादमिकी को रोजी रोटी प्रदान करने वाली केन्द्रीय अवधारणायें और उनसे सम्बन्धित तप की अट्टालिकायें और ध्वंस भी जुड़ते हैं। 

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भारतीय सन्दर्भ में आर्य आक्रमण और जातीय सर्वनाश की चूर चूर हो चुकी परिकल्पनायें अभी भी केन्द्र में खरमंडल मचा रही हैं क्यों वे कि दारू बोटी से ले कर सम्मान तक की मौलिक वासनाओं की पूर्ति का साधन हैं। इन्हें वेंटिलेटर पर जीवित रखने वालों के तर्क बहुत सरल हैं:

(1) मुख्यभूमि भारत का बहुसंख्य काला है। स्पष्ट है कि गोरा रंग बाहर से आया।

(2) वर्ण व्यवस्था के शीर्ष पर जो हैं वे अधिकतर गोरे और तीखे नयन नक्श वाले हैं जिसकी साम्यता कॉकेशियन और मध्य भौगोलिक जातियों से है।

(3) जीन सम्बन्धित आधुनिक शोध भी इन साम्यताओं को दर्शाते हैं।

पूर्वग्रह और संस्कारजन्य आग्रह सबमें होते हैं, अकादमिकी में भी हैं लेकिन इस मामले में बहुसंख्य को अन्धा किये हुये हैं। तथ्यों का नकार है, तोड़ मरोड़ है और सुविधा पूर्वक पूर्ण उपेक्षा के साथ बकलोली भी!

ये सारी बातें समीकरण के दायीं ओर दिखती परिणाम हैं। इनके आधार पर बायीं ओर को गढ़ा जाता है। एक परिणाम के आधार पर उसकी जननी प्रक्रिया गढ़नी हो तो चर कारकों की संख्या, उनका स्वभाव और उनमें आपसी सम्बन्ध आदि का चयन बहुत कुछ शिल्पी पर निर्भर करता है। यहीं पर मामला वस्तुनिष्ठता से परे हटता है।

 

आइये देखते हैं। पहले बिन्दु क्रमांक 3, क्यों कि वह ‘वैज्ञानिकता’ का आवरण पहने हुये है। जीन सम्बन्धी शोधों में भी वही चयनी मानसिकता काम करती है। मातृपक्ष के जीन देखे जायँ या पिता के पक्ष के, नमूनों की संख्या, विविधता और उनका प्रसार परास कितनी हो, किस कारक पर केन्द्रित हुआ जाय और सबसे बड़ी बात कि उद्देश्य क्या हो। पक्ष और विपक्ष दोनों ओर पर्याप्त परिणाम उपलब्ध हैं, सबकी अपनी सीमायें हैं। उन पर न जाते हुये उस खोज की बात करते हैं जिसके अनुसार पचास-साठ हजार वर्ष पहले अफ्रीका से पहले मानव निकले, कुछ नीचे से और कुछ ऊपर भूमध्य सागर के आसपास आ कर बँटते हुये भारतीय क्षेत्र और यूरोप की और बढ़े। इसका भी खंडन अब अफ्रीका और भारत में मिले कुछ अवशेषों से होने लगा है लेकिन बात है महत्त्वपूर्ण, इतनी महत्त्वपूर्ण J कि इस तथ्य को नकार जाती है कि मूल स्रोत में तो लगभग सब काले मोटी रूपरेखा वाले हैं लेकिन अन्य स्थानों पर लाल, पीले, श्वेत, गेंहुये रंग और तीखे मोटे नयन नक्श वाले कैसे? रंग को छोड़ दें तो स्वयं भीतरी अफ्रीका में भी कद काठी और नयन नक्श में पर्याप्त विविधता है। कुछ लोग उत्परिवर्तन और जलवायु के प्रभावों से इसका उत्तर देने के प्रयास करते हैं लेकिन बात उतनी आसानी से मन में नहीं उतरती जितनी आसानी से प्रश्न। इसका एक आसान उत्तर है – विश्व के कई भागों में समांतर रूप से मनुष्यों की जातियाँ थीं जो पहले तो अलग थलग रहीं लेकिन कई कारणों से प्रवजन और लैंगिक मिलन में लिप्त हो समूची धरा पर फैल गईं। विविधता आज भी उतनी ही है लेकिन भौगोलिक रूप से सुनिश्चित सीमाओं में बँधी हुई नहीं है। हाँ, उत्परिवर्तन और जलवायु के प्रभाव निस्सन्देह हैं लेकिन ऐसे नहीं कि प्रमुख माने जायँ।

 

बाकी दो बिन्दुओं को मिला जुला कर समझते हैं। पहले एक प्रश्न - भारत की सीमायें शाश्वत हैं या कुछ प्राकृतिक और राजनैतिक कारकों के आधार पर हमने खींची है? स्पष्टत: हमने खींची हैं। जो आज है वह 1947 के पहले कुछ और था, वह 1700 में कुछ और था तो 700 में कुछ और। सात हजार वर्ष पहले तो एकदम अलग था। यह बहुतेरे कारकों के लिये सत्य है और सीमाओं के लिये भी। भौगोलिक कारणों से एक दूसरे से अलग थलग प्रजातियाँ यहाँ भी थीं, विकसित होती रहीं। समय ने करवट ली तो एक दूसरे के साथ युद्ध, संवाद, सम्मिलन हुये। मनुष्य ने यात्रायें भी खूब कीं। इन सबका पहला आभास आदिकाव्य रामायण में मिलता है जिसमें वानस्पतिक और भौगोलिक विविधताओं के जीवंत वर्णन हैं। उत्तर पश्चिम में दूर तक फैली वैदिक जनजाति थी जिसमें गतिशीलता अधिक थी। व्यापार उनका एक मुख्य कर्म था और पुरोहित मुख्य कर्मी जो संगीत, काव्य और कथावार्त्ता में निपुण थे। यह भी संभव है कि वे गेंहुये पहले तो वे पूरे भारत में फैले थे लेकिन किसी बहुत ही विनाशकारी प्राकृतिक घटना ने उन्हें उत्तर पश्चिम में सीमित कर दिया। उनकी ऋचायें उन पुरनियों का स्मरण बहुत ही लगाव के साथ करती हैं, साथ ही उहात्मक गाथाओं के माध्यम से वैसी घटनाओं के संकेत भी देती हैं। वे अपनी विधि ‘अपनाने’ में बहुत आगे थे। व्यापार, संघर्ष और जीवनपद्धति को साथ लिये वे बढ़ते मिलते गये। हारे भी, जीते भी लेकिन समायोजन के अपने विशिष्ट गुण के कारण दूसरों को अपनाते, उनके जैसे होते और उन्हें अपने जैसा करते चले गये। समय ने करवट बदली, नदियाँ सूखीं, अकाल पड़े, विराट स्तर पर प्रवजन हुये। वैदिकों ने नयी बातें सीखीं, नये जन को अपने में स्थान दिया, उनके हुये और धारा बहती रही। वे आक्रांता, आक्रमणकारी या बाहरी तो थे ही नहीं! हाँ, उनके समाज और बनावट में दीर्घजीविता सबसे प्रबल शक्ति थी, समायोजी जो थे!

 

जब हम उस समय में पहुँचते हैं जिसे कि आज इतिहास कहा जाता है तो पाते हैं कि सुदूर उत्तर, मध्य और पश्चिम से पर्थियन, मेसीडोनियन, बैक्ट्रियन, सीथियन, शक, हूण आदि भारत में घुसे चले आ रहे हैं। इनमें से अधिकतर उस कथित आर्य रक्त वाले ही हैं जिन्हें कि वैदिक आक्रांता बताया जाता रहा है। कुछ का शासन क्षेत्र मगध तक फैला मिलता है और फिर कुछ सौ वर्षों में ही इनकी अलग पहचान समाप्त हो जाती है। गये कहाँ वे? कहीं नहीं गये, यहीं हैं - हमारे रक्त में। यहाँ के उन समायोजी पुरोहितों ने उनको अपना लिया। यदा कदा ऐसा हुआ कि राजा ने भी अपने लिये पुरोहित वर्ग बना लिया। चूँकि वे अधिकतर शासक और व्यापारी प्रभु वर्ग से थे इसलिये उनका समायोजन भी क्षत्रिय और वैश्य वर्ण में हुआ जो कि प्रभु वर्ग था। जो थोड़ी सी जीन साम्यता मिलती है न, उनके कारण है न कि किन्हीं आक्रांता आर्यों के कारण। वर्ण व्यवस्था के शीर्ष पर गोरे गेंहुये रंग और तीखे नयन नक्श की बहुलता का एक कारण यह भी है।

 

जब श्वेत अंग्रेज यहाँ आये तो किस लिये आये? व्यापार करने आये। शासन करने की सुविधा दिखी तो उसमें भी लग गये। चालाक थे – वैश्य और क्षत्रिय तत्त्व की सामाजिकता को शीघ्र समझ गये। तथ्यों को तोड़ मरोड़ अपने अनुसार ढाल लेना आसान था, आखिर वे अपने द्वारा रचे ‘आर्य’ जन के समान ही तो काम कर रहे थे! हमने उनके छ्ल को भी अपना लिया और वे उसे यहाँ छोड़, हमारा धन ले चले गये। यह व्यापार नहीं, वह वृत्ति थी जिसे हमारे यहाँ राक्षस कहा जाता था, जिसे अपनाने वाला गोरा हो या काला, ब्राह्मण की संतान हो या शूद्र की – ‘अनार्य’ कहलाता था। उन अनार्यों को भी उनके परिवारी और अनुचर ‘आर्य’ कह कर ही बुलाते थे वैसे ही जैसे हम लोग आज भी ‘साहब’ को अपनाये हुये हैं। 

  

भारत आज भी साँवलापन प्रधान है। इसके दो साँवले अवतारी पुरुष आज भी जन जन में रमे हुये हैं। नस्ल या प्रजातीय शुद्धता की विदेशी मान्यता यहाँ कभी प्रधान नहीं रही। यहाँ आर्य का अर्थ श्रेष्ठ जीवन मूल्य से रहा न कि गोरे दुधिया वर्ण से। आम जनता का किसी पुराने शासक वर्ग के देह समान होने की इच्छा, वह भी ऐसी कि क्रीम पोत कर उनके जैसा होने के हास्यास्पद प्रयत्न होने लगें, उसकी धारा में बाभन, ठाकुर, बनिया, सूद सभी वर्णों के साँवले बहने लगें और गोरापन एक बहुत समृद्ध, फलता फूलता अरबी खरबी उद्योग हो जाये; समझ के बाहर है। कोई समझायेगा?    

शनिवार, 12 सितंबर 2015

कहनी कहानी

कहानियों का मेल कहने से बैठता है लेकिन हर कहा हुआ कहानी नहीं हो पाता। होने भर और हो पाने का विभेद कहानियाँ मिटा देती हैं।  जब मैं कहानी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ तो मेरा कहनाम न तो संस्मरण से है और न ही उन ऐतिहासिक व्यक्तियों या घटनाओं से जो महाकाव्य और अतिशयोक्ति बन देवताओं और देवियों को अमरत्त्व और सौन्दर्य प्रदान करते हैं। कहानियाँ घटनाओं की निर्जीव समुच्चय नहीं, उनकी जीवित देह होती हैं जिसमें रक्त के स्थान पर अमृत बहता है और साँसों के स्थान पर शाश्वत भावनायें। कहानियाँ सबकी होती हैं और किसी की भी नहीं! मूर्खता वश ही सही या सही कहें तो उत्सुकता भर मैं प्राय: स्वयं से पूछता रहा हूँ कि पहली कहानी किसने रची होगी? यह प्रश्न अपने आप में एक कथ्थक की प्रस्तावना है, उस कथ्थक की जो कहते हुये थकता नहीं।
अपने सृजन में एक कहानी नितांत वैयक्तिक होती है लेकिन ओठ से मुक्त होते ही या यूँ कहें कि मन में उठान पाते ही सबकी हो जाती है, कह जो दी जाती है! यह वह चादर होती है जिसे किसी ठिठुरती रात में समय को उसका सही स्थान बताने और पीड़ा को विश्राम देने के लिये कोई माँ बच्चों के साथ ओढ़ती है और ऊषा की ऊष्मा छिटकते ही पंछियों के साथ आकाश की और छोड़ देती है कि जाओ, पूस की रातों से कुछ बच्चों को बचाओ! कड़कती धूप भरे दिन में दुपहरिया छुट्टी की छाँव होती है कहानी। तब जब कि श्रम सीकर सूखते हैं और भीतर की उमस थकान से बातें करती है कि देखो न! हाथों की झुर्रियाँ रेखाओं से उलझ नियति की लेखनी बन गई हैं, तो ऊँघते सपनों के नीरस भोजपृष्ठ रंगीन होने लगते हैं, काले, नीले, लाल, पीले। थके प्रकाश वाली साँझ को जब गमछा चिंताओं को खोलता बिछता है तो ओठ पर वे रंग सजने लगते हैं जिन्हें उकेरना किसी के वश का नहीं, कथ्थक के भी नहीं। कहानियाँ अनकही कहन होती हैं, कह भर देने से अपराधबोध टूटता है कि अब तक क्या जिये और एक नया दिन सामने आ खड़ा होता है, चलो, जीने को समय की किल्लत कभी नहीं!
कहानियाँ अच्छी या बुरी नहीं, बस होती हैं, वैसे ही जैसे रामसिंह किसान होता है और उसके बैल होते हैं। वैसे ही जैसे सचिव मीरा और उसकी कोई बॉस होती है, वैसे ही जैसे किसी भास्कर की कोई लीलावती होती है। इन सबकी तरह ही मुझे आज तक कोई भी अच्छी या बुरी कहानी नहीं मिली। अनजान, पास होते हुये भी किसी दूसरे लोक सम दूर जन में अच्छा क्या, बुरा क्या? पहचान भरा अचीन्हापन कहानियों को शाश्वत बनाता है। भीतर का सारा दुःख सुख हम उनमें उड़ेल उन्हें शून्य पी एच का बना देते हैं। उसके बाद कोई अच्छाई, कोई बुराई हमें भिगोती सताती नहीं। एकदम सहज भराव के साथ हम प्रारम्भ करते हैं – एक अच्छी परी थी और एक बुरा राक्षस... विश्वास करो, कहानियाँ अपने आप में अच्छी बुरी नहीं होतीं, वे प्रार्थना भरी होती हैं। मनुष्य की पहली ऋचा ‘अग्निमीळे’ से नहीं, उससे पहले, बहुत पहले ‘एक’ से प्रारम्भ हुई – एक था बच्चा, एक थी गइया... आश्चर्य नहीं कि मनुष्य की सबसे विवादास्पद खोज ईश्वर भी ‘एक’ ही है!
प्राणवायु के पश्चात जो सबसे आवश्यक उपादान है वह कहानी है। मनुष्य भूखे प्यासे रह सकता है लेकिन कहानी के बिना नहीं। यह कथन बहुत विचित्र गल्प सा लग सकता है लेकिन इस पर ध्यान देने से कि बात मनुष्य की हो रही है, स्पष्ट होने लगता है। क्षुधा और तृप्ति के बीच जो कुछ भी घटित होता है वह कहानी नहीं तो और क्या है? वायुमंडल का प्रदूषण यदि अब भी पराजित है तो वह इसलिये कि उसमें अरबो खरबो वर्षों की कहानियाँ घुली हुई हैं। कहानियाँ न मरती हैं और न हमें मरने देती हैं। अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है कि हम जब तक जीते रहेंगे, कहानियाँ कहते रहेंगे और जब तक कहानियाँ घटती रहेंगी, हम जीते रहेंगे। तुम कहोगी कि ऐसे तो प्रलय कभी होगा ही नहीं? जी, प्रलय जैसा कुछ होता ही नहीं। लय भर होता है। उसमें अनकही कहानियों के आवर्त होते हैं, आवर्त से अनुनाद और अनुनाद राग भर किसी स्तनाग्र से दुग्ध धार फूट पड़ती है। मनुष्य के बच्चे पहली रुलाई रोने लगते हैं – केहाँ, केहाँ ...
... ठहरो, ठहरो! तुम्हारी बात में दोष है, उलट पलट है।
धुत्त! तुम इस समय ‘व्यस्त’ हो इसलिये ऐसा कह रही हो। आज छुट्टी के समय किसी छाँव में बैठ विराम लेना, तुम्हें पहली कहानी सुनाई देगी, एक था मनु, एक थी शतरूपा और एक थी इड़ा। उस समय कान में कहते समीर से कहना - ठहरो, ठहरो! तुम्हारी बात में दोष है, उलट पलट है। वह हँसेगा, खूब हँसेगा। तुम भी मुस्कुरा नहीं दी तो कहना ...        

शनिवार, 15 अगस्त 2015

2. तमिळ देशे डाभिल संवादं - तमिळ राष्ट्रगान 'तमिळ ताय वाळत्तु'

स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रगान के पहले एक और गान के बजने और उसको उतना ही आदर देने पर मेरा माथा ठनका – और कहीं ऐसा नहीं देखा! मैं डाभिल को ढूँढ़ने लगा। मेरी छठी इन्द्रिय बता रही थी कि इसका सम्बन्ध अवश्य तमिळ बनाम आर्य विवाद से है और इस मामले में उलझाव सुलझाव के लिये डाभिल से अच्छा कौन हो सकता है? मैं ग़लत था। डाभिल छुट्टी मुबारक मना रहे थे। बगल में बैठे एक दूसरे सज्जन से पूछा तो उन्हों ने गीत का नाम बताया – तमिळ ताय वाळत्तु अर्थात तमिळ माँ का वन्दन आह्वान।

मैंने मन ही मन अपनी सराहना की कि अनुमान सही साबित हुआ और उनको खोदना शुरू कर दिया। ऐसा क्यों? राष्ट्रगान से पहले?? उन्हों ने कहा – यहाँ ऐसा ही है। मैंने प्रतिवाद किया – और कहीं नहीं, यहीं क्यों? वह भारतीय से तमिळ हो आये और चिढ़ कर बोले – हम लोग ऐसे ही हैं। तमिळनाडु में ऐसा ही है। We are much older than India. Long before India came into picture, Tamil nation was there!  मुझे लगा कि कोई इलहामी कह रहा है – पहले इलहाम, फिर हिन्दुस्तान, इलहाम सबसे पुराना मजहब है। आश्चर्य नहीं कि इस भूमि से कभी द्रविड़्स्तान की माँग उठी थी। पेरियार और जिन्ना ...   

...भटकते मन को राह पर ला बात बदल कर मैंने रुचि दिखाई – अच्छा! लेकिन यह गीत तो पुराना नहीं लग रहा! I mean tune is modern. किसने रचा यह गाना? तब तक मैं इंटरनेट सर्च में लग चुका था और वे भी। अपनी स्क्रीन देखते हुये वे बोले – मनोनमनियम सुन्दरम पिल्लई ने लिखा और धुन किसी अंग्रेज ने बनाई थी। Why should we give priority to that Hin…? कहते हुये वह रुक गये तो मैंने कहा – राष्ट्रगान तो बँगला में है। वे बोले – हाँ, वही मैं सोचने लगा – यह तो वैसी ही बात हुई कि सारा दक्षिण भारत मदरासी! इन्हें आम उत्तर भारतीय ठीक ही पहचानता है। अस्तु...

... अलप्पुळ में जन्मे पिल्लई महाशय आज केरल कहलाने वाले प्रांत के तिरुअनंतपुरम से जुड़े थे। पश्चिमी साहित्य, विज्ञान और तकनीक से खासे प्रभावित थे। उन्हों ने 1891 में लम्बा गीति काव्य रचा – मनोनमनियम। तमिळ राष्ट्रगीत ‘तमिळ ताय वाळत्तु’ इस काव्य का मंगलाचरण है। ‘भारतीय’ राष्ट्रगान और तमिळ राष्ट्रगान दोनों में समानतायें हैं – दोनों के रचयिता पश्चिमी रंग में रँगे थे और दोनों अंग्रेजी रचनाओं को बहुत सूक्ष्म और नायाब ढंग से अनुदित, परिवर्तित, सृजित आदि कर अपना नाम देने में महारत रखते थे।

पिल्लई जी ने लॉर्ड बुलवेर लिट्टन की लम्बी कविता ‘The Secret Way’ का पुनर्संस्करण कर उसे 'मनोनमनियम' नाम दिया और यह ग़जब घोषणा की,

 “Among the rich and varied forms of poetic composition extant in the Tamil language, the dramatic type, so conspicuous in Sanskrit and English, does not seem to find a place. The play here submitted to the public is a humble attempt to see whether the defect may not be easily removed.”

 तब तक मैक्समूलर की आर्य परिकल्पना 'बहुत पढ़े लिखों' में पैठ बना चुकी थी। भारोपीय भाषाओं की अग्रणी के रूप में छान्दस और साहित्यिक संस्कृत की चर्चा भी स्थापित हो चुकी थी। कांग्रेस के रूप में ‘उत्तर के आर्यों’ का वर्चस्व भविष्य के गर्भ में था लेकिन तमिळ गौरव को आँच लगने लगी थी। ऐसे में पिल्लई महाशय ने यह गीत रचा जिसमें सम्भवत: पहली बार, प्राचीन चोल-चेर-पांड्य शासकों की सामरिक साम्राज्यवादिता से इतर, साहित्यिक साम्राज्यवाद का बीज वपन किया गया। अपने मूल रूप में इस गीत में ‘आर्य’ भाषाओं के प्रति तिरस्कार तो था ही, परोक्ष रूप से उन्हें मृत और मिश्रित घोषित कर अक्षतयोनि पवित्र देवी के रूप में तमिळ भाषा को चिरयौवना बता उसे प्रतिष्ठित किया गया था।

 

 

நீராரும் கடலுடுத்த நிலமடந்தைக் கெழிலொழுகும்

சீராரும் வதனமெனத் திகழ்பரதக் கண்டமிதில்

தெக்கணமும் அதிற்சிறந்த திராவிடநல் திருநாடும்

தக்கசிறு பிறைநுதலும் தரித்தநறும் திலகமுமே!

அத்திலக வாசனைபோல் அனைத்துலகும் இன்பமுற

எத்திசையும் புகழ்மணக்க இருந்தபெரும் தமிழணங்கே!

பல்லுயிரும் பலவுலகும் படைத்தளித்து துடைக்கினுமோர்

எல்லையறு பரம்பொருள்முன் இருந்தபடி இருப்பதுபோல்

கன்னடமுங் களிதெலுங்கும் கவின்மலையாளமும் துளுவும்

உன்னுதரத் தேயுதித்தே ஒன்றுபல வாகிடினும்

ஆரியம்போல் உலகவழக்கழிந் தொழிந்து சிதையாவுன்

சீரிளமைத் திறம்வியந்து செயன்மறந்து வாழ்த்துதுமே

सब भाषाओं की जननी 
वन्दन हे तमिळ माता!


उफनता सागर वस्त्र सम लिपटा है ऊर्जस्वी महि से!
सुन्दर वदन, उदात्त भारतीय उपमहाद्वीप! 
दक्षिण! द्रविड़ देश विशेष!


सुन्दर तिलक है तुम्हारे सुन्दर वक्र ललाट
तिलक सुगन्ध से हर्षोन्मत्त संसार 
देवी तमिळे!

सब दिशाओं में भी फैलता तुम्हारा ऊष्म उत्साह।

 
अनेक जीवन! अनेक संसार, सब तुम्हारे रचे और तुमसे विनशे भी!
सर्व श्रेयस्करी रचयिते! तुम सदा बनी रहो,
जैसे कि अब तक हो!

 
कन्नड़, आनन्दी तेलुगू, तुलु के साथ नन्हीं प्यारी मलयालम!
सब तुमसे ही उपजीं! तुम्हारी सरजीं! तुमसे निकसीं! तुम्हारी रूप!   

आर्य भाषाओं से इतर,
जिन्हें न कोई बोलता, जो हैं गत और मृत।

 
तुम बनी रहो सदा चिरयौवना नवीन,
अकेली तुम बनी रहो शुद्ध भी सदा!
मैं प्रसन्न, तुम्हारी प्रशंसा में सुन्दर तमिळ सदा अक्षतयोनि!
मैं विस्मित अचरज भर! मैं तुम्हें सराहूँ, तुम्हें सराहूँ।
 
 

इस पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता आन्दोलन तेज होता गया, उत्तर 'हाबी' होता गया और 'बौद्धिक' तमिळों की सामूहिक हीनता ग्रंथि बढ़ती गयी। मद्रास प्रेसीडेंसी में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सन् 1937 में पहली सरकार बनी तब राजगोपालाचारी ने विद्यालयों में हिन्दी का पठन पाठन अनिवार्य कर दिया। ई.वी. रामास्वामी पेरियार और जस्टिस पार्टी ने हिंसक विरोध का नेतृत्त्व किया। तमिळ भूमि में अब तक वायवीय रही भाषिक और जातीय घृणा का ठोस बीज बो दिया गया। 1940 में कांग्रेस सरकार के हटने पर ब्रिटिश सत्ता ने हिन्दी का 'आरोपण' हटा लिया।

स्वतंत्र भारत के संविधान में हिन्दी और अंग्रेजी को साथ साथ 15 वर्षों तक बना रहने वाला राजभाषा का दर्जा द्रविड़ दबाव समूहों के कारण दिया गया। 26 जनवरी 1965 से एक दिन पहले जब कि अंग्रेजी को हट जाना था, मदुरै में हिंसक विरोध ने जन्म लिया और देखते देखते पूरा तमिळ प्रांत सुलग उठा। दो वर्षों तक चले सिंचन के पश्चात चुनावों में फसल काटी विजयी द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी ने। तमिळ गौरव को पुनर्स्थापित करने के प्रयास तो बहुत पहले से जारी ही थे। 1966 में कुआलालम्पुर, मलेशिया में पहला विश्व तमिल सम्मेलन आयोजित किया गया। तब से चेन्नई, पेरिस. जाफना, मदुरइ, कुआलालम्पुर, पोर्ट लुइस, तंजावुर आदि नगरों से होते हुये नवें तक आयोजन हो चुके हैं।

इन्हीं के समांतर जून 1970 में  तमिळ ताय वाळत्तु को राज्यगान बना दिया गया। तमिळ 'राष्ट्रीयता' के उफान में इसे हर राजकीय अवसर पर भारतीय राष्ट्रगान से पहले गाया जाता है। इसका संगीत रचा प्रसिद्ध तमिळ संगीतकार 'मेल्लिसई मन्नार' MSV अर्थात मनयंगत सुब्रमनियन विश्वनाथन ने। चूँकि मूल गीत स्पष्टत: भाषिक अहंकार और तिरस्कार से भरा था इसलिये उसे संशोधित कर वैसे वाक्य निकाल दिये गये और गीत को संगीत अनुरूप करने के लिये पुनर्व्यवस्थित भी कर दिया गया:

நீராரும் கடல் உடுத்த நில மடந்தைக் கெழிலொழுகும்
சீராரும் வதனமெனத் திகழ்பரதக் கண்டமிதில்
தெக்கணமும் அதிற்சிறந்த திராவிட நல் திருநாடும்
தக்கசிறு பிறைநுதலும் தரித்தநறும் திலகமுமே!
அத்திலக வாசனைபோல் அனைத்துலகும் இன்பமுற,
எத்திசையும் புகழ்மணக்க இருந்த பெரும் தமிழணங்கே!
தமிழணங்கே!
௨ன் சீரிளமைத் திறம்வியந்து
செயல் மறந்து வாழ்த்துதுமே!
வாழ்த்துதுமே!
வாழ்த்துதுமே!


https://youtu.be/cfghItANhUU

भाषा के समांतर ही जातीय आन्दोलन भी चलते रहे। उनके लिये संस्कृत उन आक्रमणकारी आर्यों की भाषा है जिन्हों ने विश्व की सबसे पुरानी 'द्रविड़' सिन्धु सभ्यता का नाश कर दिया। हिन्दी उन ब्राह्मणों की आधुनिक हथियार है जो उत्तर से आते राजनैतिक वर्चस्व के अश्व पर सवार हैं। तमिळ से जुड़े किसी भी आन्दोलन के लिये कम्बन की रामायण सांस्कृतिक प्रतीक नहीं क्यों कि वह हिन्दू आर्य का प्रतिनिधित्त्व करती है। उसके स्थान पर सेकुलर तिरुक्कुराल को प्रतिष्ठा दी गयी है ताकि तमिळ जन को धार्मिक के बजाय 'भाषिक' और 'जातीय' आधार पर ध्रुवित किया जा सके।

पूरे इतिहास को जानने के पश्चात तमिळ को संस्कृत के प्रदूषण से मुक्त करने के अभियान, उत्तर भारतीय भाषाओं के प्रति तिरस्कार भाव और 'मृत' संस्कृत के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में संसार की एकमात्र जीवित 'क्लासिक' भाषा के रूप में तमिळ की स्थापना के आन्दोलन के कारण समझ में आ जाते हैं। साथ ही यह भी कि ऐसी क्षति हो चुकी है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता...

... डाभिल की अनेक बातें मन में चल रही हैं। पता चल गया है कि कहाँ से उधारी ली है! जाने मोइन-जो-दड़ो के जन मृत किस कारण हुये लेकिन ये तो सच हैं ही कि तमिळ राष्ट्रगान भी भरतवंशी आर्यों के नाम से ही इस देश को भारत பரதக் बताता है और एक दूसरे आर्य भरतमुनि के सृजन भरतनाट्यम से तमिळनाडु अपने को कभी अलग नहीं कर पायेगा, आर्य दूषण बना रहेगा!
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Although Tamil and a few other languages such as Greek, Latin and Sanskrit enjoy the status of classical language in the academic world thanks to their antiquity and rich literary heritage, Tamil is the first living language to be given the official status of a classical language. – Karunanidhi
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The politics of Tamilnadu during the twentieth century, as fascinating as it is complex, has been the subject of numerous studies. In Tamil politics, we find a textbook case of how issues of language and cultural identity can become prime factors in the political process.

I have already suggested that the hallmark of Tamil nationalism is vigorous opposition to linguistic and economic domination by the north. While no serious politician any longer argues that Tamilnadu should secede from the Indian union, the political rhetoric heard in Madurai during the conference week proved that language is far from a dead issue in the Tamil political scene.

All politicians who hold the slightest hope of success in Tamilnadu are obliged to take a strong stand against Hindi imposition, a sentiment that was voiced openly and loudly at the many ancillary conference events.
– From a Report on Tamil World Conference, 1981

(http://www.tamilnation.co/conferences/cnfMA81/index.htm)