शनिवार, 10 मार्च 2018

श्रीकृष्ण जन्म समय : महाभारत, हरिवंश एवं सर्वतोभद्र Birth of Krishna Mahabharat Harivansha Sarvatobhadra

Birth of Krishna Mahabharat Harivansha Sarvatobhadra
श्रीकृष्ण जन्म समय : महाभारत, हरिवंश एवं सर्वतोभद्र
महाभारत का खिलभाग 'हरिवंश', श्रीकृष्ण जीवन का सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक वृत्तान्‍त है। उसमें उनके जन्म का महीना नहीं दिया गया है।
उसके विष्णु पर्व में भगवान को अठमासा बताया गया। एक प्राचीन परम्परा वर्ष का आरम्भ माघ से बताती है। यदि वहाँ से आठ महीने गिनें तो भाद्रपद आता है, क्या ठीक है, ठीक ठीक तो संस्कृतज्ञ ही बता पायेंगे।
अर्द्धरात्रि को जन्म, अभिजित मुहूर्त। तैत्तिरीय ब्राह्मण अनुसार पाँचवा मुहूर्त अभिजित होता है। दिन के पन्द्रह मुहूर्तों को रात में दुहरा कर देखें तो अर्द्धरात्रि के समय अभिजित होने के लिये मुहूर्त (48 मिनट का समय) गणना का आरम्भ रात के 2 बजे से ठहरता है जिसे आज कल सैद्धांतिक ज्योतिष में जीव या अमृत नाम दिया जाता है।
दूसरा विजय नाम का मुहूर्त किसी अन्य नाम पद्धति (रात के लिये प्रचलित‌) से सम्बंधित प्रतीत होता है।
तारों भरी रात शर्वरी कहलाती है जोकि कृष्ण पक्ष की संकेतक है। समस्या जयन्ती नाम एवं अभिजित नक्षत्र से आती है।
सिनीवाली, राका इत्यादि अन्य रातों के नामों की भाँति सम्भव है कि अष्टमी की रात जयंती कहलाती हो किंतु अभिजित नक्षत्र?

अथर्वण संहिता में नक्षत्र 27 के स्थान पर 28 हैं जोकि प्राचीन पद्धति थी। उत्तराषाढ़ एवं श्रावण नक्षत्रों के बीच अभिजित नक्षत्र बताया गया है जोकि आज के अभिजित (Vega) से भिन्न है।

महाभारत में अभिजित के पतन की कथा है। उस कथा तथा सर्वतोभद्र चक्र को मिला कर देखने पर श्रीकृष्ण जन्म का नक्षत्र अभिजित या रोहिणी होने का मर्म स्पष्ट हो जाता है। 
महाभारत के वनपर्व में ऋषि मारण्‍डेय इन्द्र के माध्यम से बताते हैं - अभिजित रोहिणी की 'छोटी बहन' है जो स्पर्धावश तपस्या करने वन में चली गयी है। नक्षत्र के गगन से च्युत हो जाने के कारण मैं मूढ़ हो गया हूँ।
उन्हें उस ब्रह्मा से सलाह लेने की बात बताई जाती है जिन्हों ने धनिष्ठा सहित सभी नक्षत्रों को बना कर नभ में स्थापित किया। अभिजित का काम कभी रोहिणी करती थी।


स्पष्टत: यह संवाद उस नाक्षत्रिक गति को दर्शाता है जब महाविषुव मृगशिरा से हटते हुये रोहिणी को भी पार कर चुका था और कृत्तिका तक आने से पहले इन दोनों के मध्य छोटी बहन अभिजित 'कल्पित' की गयी। वह भी 'वन में चली गयी' अर्थात महाविषुव उससे भी हट गया। महाभारत का यह भाग भारतीय नक्षत्र गणना के स्वर्ण युग को दर्शाता है जब आकाश और भूमि की बातें संगति में थीं। आकाश में महाविषुव की सीध में कोई स्पष्ट नक्षत्रमंडल न होने पर अभिजित को गढ़ा गया और बाद में वन को भेज दिया गया क्यों कि उसके स्थान पर दूसरा नक्षत्र आ गया था। 28 से 27 नक्षत्र होने के पीछे यह कारण भी है। सम्पूर्ण विश्लेषण में कहीं भी न तो राशि नाम आया, न उसकी सहायता लेने की आवश्यकता पड़ी।
श्रीराम हों या श्रीकृष्ण, बहुत प्राचीन हैं, राशि आधारित सैद्धांतिक ज्योतिष से बहुत पहले के। राशियों की बातें अपेक्षतया नये ग्रंथों जैसे पुराणों में मिलती हैं या क्षेपक रूप में जोकि स्पष्टत: सैद्धांतिक गणना कर पुरा घटित को उनके अनुकूल वर्णित करने के प्रयास मात्र हैं।

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